श्मशान के पास 30 मकान वीरान
सरकारकाहमेशा प्रयास रहता है कि जनहित स्कीमों का लाभ सभी को मिले। इसलिए सरकार हर संभव प्रयास करती है। लेकिन खेड़ा ब्लाॅक के गांव बरास में लगभग 17 साल पहले कमजोर वर्ग के लोगों के लिए बनी कॉलोनी में 30 मकान अभी तक उनमें आकर रहने वालों की इंतजार में है।
शिअद सरकार ने 1997 में बिना घर के रह रहे लोगों को घर तैयार कर देने की चलाई स्कीम के तहत गांव बरास में भी 30 ऐसे मकानों की काॅलोनी के निर्माण का एेलान किया था। जिसका शिलान्यास तत्कालीन राज्य मंत्री और पंथ र| जत्थेदार गुरचरण सिंह टोहरा ने 13 अगस्त 1998 को किया था। गांव में अनुसूचित जाती के बेघरों को बसाने के लिए 20 लाख की लागत से काॅलोनी बननी शुरू हुई थी। काम शुरू होने के बाद लोगों को अपने घर की उम्मीद जागी थी। गांव के लोगों ने इसके निर्माण में मजदूरी कर योगदान भी दिया। लेकिन काॅलोनी के निमार्ण काम पूरा होने के बाद उसमें कोई भी रहने को नहीं आया। लोगों का आरोप है कि तैयार काॅलोनी में कोई भी रहने के लिए इसलिए तैयार नहीं हुआ क्योंकि निर्माण काम में इस्तेमाल सामान घटिया था। हालात यह हो गए कि छतों, दीवारों का पलस्तर भी गिरने लगे।
टूटगए दरवाजे और खिड़कियां : गांवबरास में लगभग 17 साल पहले बनी इस काॅलोनी का दौरा किया, तो देखा गया कि काॅलोनी बदतर हालत में है। डोर और खिड़कियां टूट गई हैं। जंग खाए लोहे के दरवाजे कुछ एक घरों में मौजूद थे और कई मकानों के तो दरवाजे और खिड़कियां भी कुछ असामाजिक तत्वों ने उतार लिए थे। चारों ओर गंदगी और घास-फूस के अलावा कुछ नहीं है। पानी-बिजली का कोई प्रबंध ही नहीं था। ही कोई साफ-सफाई ही थी। हर घर में दो कमरे, एक रसोई, एक छोटी-सी गैलरी पर सरकार ने लाखों रुपए खर्चे साथ ही गांव की दो एकड़ जमीन भी इसकी भेंट चढ़ गई।
कब्रिस्तानके डर से नहीं रहने को लोग तैयार : उक्तकाॅलोनी में लोगों के रहने को लेकर गांव के लोगों से बात की गई तो उनका कहना था कि इस काॅलोनी पर लगभग 20 लाख रुपए की लागत आई थी। गांव के मोहिंद्र सिंह ने कहा कि काॅलोनी के मकानों में ही फर्श डाला गया और ही कोई बिजली पानी का प्रबंध किया गया।
काॅलोनी के तैयार होने के बाद समय-समय पर अफसरों द्वारा लाभपात्रियों की सूची तैयार कर उनको इन घरों में आने के लिए कहा था। लेकिन काॅलोनी के साथ बने कब्रिस्तान के डर से कोई भी इसमें रहने को तैयार नहीं हुआ।