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गुरु के आशीर्वाद से मैं जन्मा और पला: आत्मानंद पुरी

5 वर्ष पहले
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भास्कर संवाददाता|फिरोजपुर कैंट

महामंडलेश्वरस्वामी आत्मानंद पुरी से हुई बातचीत में जीवन के बारे में बताते हुए कहा कि मेरे माता-पिता काफी धार्मिक स्वभाव के थे, लेकिन उनके संतान नहीं होती थी। एक दिन उन्होंने अपना दुखड़ा हमारे गुरु स्वामी स्वतप्रकाश पुरी जी महाराज को सुनाया तो गुरु ने मेरे माता-पिता की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें तीन पुत्र र| प्राप्त होने का वचन दिया और कहा कि सबसे छोटा बेटा हमें दे जाना। घर पर दो बड़े भाईयो का जन्म हुआ और तीसरे नंबर पर मेरा जन्म हुआ। मेरे जन्म से पहले ही हमारे गुरु जी ब्रह्मलीन हो गए थे और उनके स्थान पर स्वामी गणेशपुरी जी महाराज गद्दीनशीन हुए। जन्म के बाद से ही मैं बीमार रहने लगा था। जैसे ही माता-पिता को गुरू का वचन याद आया तो वह मुझे आश्रम में छोड़ आएं और तभी से मेरा संत बनने का जीवन शुरू हो गया था। मैने पांच वर्ष की आयु में ही साधु जीवन धारण कर लिया था। आरंभिक शिक्षा हासिल करने के बाद मैं अमृतसर, हरिद्वार, काशी गया और मैने बनारस विश्वविद्यालय से संस्कृति में एम.ए. फिलॉस्फी की डिग्री हासिल की। फिर मैने धर्म का प्रचार शुरू किया और महा निवाणी अखाड़े से मुझे महामंडलेश्वर विद्धानो ने मुझे भागवत भूषण की उपाधि प्रदान की। उन्होंने बताया कि पांच वर्ष की आयु से शुरू हुए इस साधु जीवन ने अब तक मद भागवत, शिव पुराण, देवी भागवत, गीता, रामायण इत्यादि की सैंकड़ो स्थानों पर कथाएं कर रखी है।

आत्मानंद पुरी जी के गुरु सिद्ध महापुरुष थे और उन्होंने अनेक यज्ञ कर रखे थे। उनके मुख से निकला हर शब्द पत्थर की लकीन हुआ करता था। गौ सेवा में प्रेम होने के कारण उन्होंने अनेको गौ शालाओ का भी निर्माण करवाया।

बातचीत के दौरान आत्मानंद पुरी।

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