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आत्म और मानस चेतना ही तमाम व्याधियों से मुक्ति का मार्ग: मित्तल
अध्यात्मके बिना विज्ञान और विज्ञान रहित अध्यात्म दोनों ही अधूरे हैं। दोनों साथ-साथ चलें तो मानव जीवन में बेहद रहस्यमयी परिवर्तन होते हैं। वैज्ञानिक अध्यात्म हमारे रहस्यमय शरीर को जागृत करने में सहायक है। यह बात संजीवनी ग्रैंड मास्टर संगीता मित्तल ने संजीवनी हीलिंग टैंपल में कही। हीलिंग टैंपल में दो दिवसीय संजीवनी हीलिंग कोर्स की शुरुआत में संगीता मित्तल ने सबसे पहले अध्यात्म और मानव शरीर की संरचना के बारे में साधकों को अवगत कराया। उन्होंने कहा कि जैसै-जैसे हम अध्यात्म की गहराई में उतरते हैं तो हमें यह पता चलने लगता है कि जिस चरह हमारे शरीर में 72 हजार प्रत्यक्ष और सूक्ष्म नस नाड़ियां हैं, उसी तरह इस ब्रह्मांड में भी ऐसा ही एक एनर्जी नैट (जाल) विद्यमान है, जो हमारे शरीर की सभी नस नाड़ियों के साथ सामंजस्य बिठाता है। अध्यात्म, ध्यान, वैचारिक सकारात्मकता के अभाव में यह सामंजस्य असंतुलित हो जाता है, जो शारीरिक-मानसिक व्याधियों से मानव शरीर को घेर लेता है। ऐसे में आत्म और मानस चेतना ही तमाम व्याधियों से मुक्ति का मार्ग है।
संगीता मित्तल ने कहा कि वास्तव में हमारे पूर्व जन्मों के संस्कारों के मुताबिक हमारे शरीर में सीमित उर्जा ही है, इसलिए हमें इस सीमित उर्जा को जानते हुए और इस शरीर की सीमाओं को पहचानते हुए इस उर्जा का प्रयोग करना चाहिए। ऊर्जा का अनावश्यक प्रयोग शरीर एवं मन दोनों के लिए घातक है। उन्होंने बताया कि हम से बोला गया हर शब्द, सुनी हुई कोई भी ध्वनि और सोचा गया कोई भी विचार-कोई भी संवेदना हमारे अंदर हार्मोन और न्यूरोपैपटाईड बनाते बिगाड़ते रहते हैं, जो हमें बीमार तथा स्वस्थ रखने में मदद करते हैं। अत: जितना बोलना आवश्यक है, उतना ही बोलें। जितने विचार जरूरी हैं उतने ही बनाएं। सीमित ऊर्जा का सीमित प्रयोग हमारे भीतर स्वच्छता, निर्मलता लाता है और अभ्यास के फलस्वरूप हम ज्ञान अथवा भक्ति के सुपात्र बन जाते हैं।
होशियारपुर में मंगलवार को संजीवनी हीलिंग टैंपल में संजीवनी साधकों के साथ संजीवनी ग्रैंड मास्टर संगीता मित्तल।