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स्वतंत्रता सेनानी बंता सिंह बाजवा की 18वीं बरसी मनाई

7 वर्ष पहले
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गांवडल्लाके स्वतंत्रता सेनानी बंता सिंह बाजवा की 18वीं बरसी मनाई गई। इस दौरान उनकी प|ी महिन्द्र कौर ने आंसू भरी आंखों से बताया कि सन् 1921 में पाकिस्तान के करतारपुर में जन्मे बंता सिंह 1935 में 16 वर्ष की आयु में अंग्रेजी सेना में बतौर सिपाही भर्ती हुए थे। 1940 में उन्होंने अंगेजी सेना से बगावत कर जर्मनी में सुभाष चन्द्र बोस के साथ हो गए।

उन्होंने सुभाष चन्द्र बोस के साथ मिल कर अंग्रेज सरकार के विरूद्ध अनेकों लड़ाईयां लड़ी। उन्होंने बताया कि दिल्ली के महिन्द्रगढ़ में बम फैंकने की वजह से उन्हें ढाई साल तक महिन्द्रगढ़ की जेेल में भी रहना पड़ा। इसी दौरान उनके परिजनों ने उन्हें मृत समझ कर उनकी सभी अंतिम रस्में पूरी कर दी थी। लेकिन जब वह लौट कर आये तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने बताया कि 1947 में देश की अजादी के बाद सुभाष चन्द्र बोस लापता हो गये तथा उनके पति बन्ता सिंह बाजवा वापस अपने गांव डल्ला गये। उन्होंने बताया कि निर्धनता तथा बेरोजगारी की मार झेल पाने के कारण उन्होंने मध्य प्रदेश में बतौर होमगार्ड इस्पैक्टर नौकरी करनी शुरू कर दी। 15 अगस्त 1972 में उस समय की प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी द्वारा बंता सिंह को ताम्र पत्र देर कर सम्मानित किया तथा उसी वर्ष उनकी पैंशन भी लगा दी गई थी। लेकिन 1996 में बंता सिंह इस संसार को अलविदा कह गये। उन्होंने बताया कि अपने जीवन काल के दौरान उन्होंने 2 किताबें इंडियन टाईगरज तथा इंडियन स्ट्राईक लिखीं।

इसके अतिरिक्त उन्हें कुछ मैडलों से भी नवाजा गया जिनमें आई डी एस एम, अफ्रीका स्टार, वार मैडल, वीरे हिन्द, इस्सार कलास टू, तगमा बहादुरी,तगमा अजादी शामिल थे। बुधवार को उनकी बरसी के अवसर पर उनके परिजनों के अतिरिक्त क्षेत्र की नामवर हस्तियों ने उन्हें श्रद्धा सुमन भेंट किये। इस अवसर पर उनके साथ उनके बेटे सतनाम सिंह तथा उनका पौत्र अमृतपाल भी उपस्थित था।

बंता सिंह।

जानकारी देतीं बंता सिंह की प|ी महिन्द्र कौर और उनका बेटा सतनाम सिंह। -भास्कर