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नए परिवार को बसाने का नायाब तरीका अग्रसेन ने निकाला था
समारोह की तैयारियां पूरी, रंगारंग कार्यक्रम होंगे
कहतेहैंमहाराजा अग्रसेन के राज और राज्य में लोग बहुत खुशहाल थे। वैभव था। धन-धान्य देख दूसरे राज्यों के लोग उनके राज्य में आकर बसने लगे। काम और रहने के लिए घर की दिक्कत आने लगी। यह देख अग्रसेन जी ने एक फैसला लिया। वो यह था कि हर नए परिवार के लिए पहले से बस लोग एक ईंट और एक रुपया दान देंगे। ईंट से मकान बन जाएगा पैसे उसके रोजगार खोलने के काम आएंगे। जी हां, हम इसी युगपुरुष की बात कर रहे हैं।
महाराजा अग्रसेन का जन्म राजा वल्लभ सेन के घर हुआ था। इनका विवाह कोल्हापुर के नागराजा महिधर की बेटी माधवी से 15 साल की आयु में हुआ था। जब इन्होंने प्रताप नगर का राज-काज देखना शुरू किया तब हर तरफ दुख था। खजाने खाली थे। सूखा पड़ा हुआ था। कारण था कुछ समय पहले ही महाभारत का युद्ध होकर हटा था। इसी में इनके पिता वीरगति को प्राप्त हुए थे।
एक दिन इनका अपने चाचा से किसी बात पर मनमुटाव हुआ तो उन्होंने इन्हें घर से निकाल दिया। वह बहुत दुखी हुए। उदास मन से ऋषि गर्ग के पास पहुंचे। ऋषि ने इन्हें तपस्या करने को कहा। वह बिना क्षण गंवाए अग्रोहा के घने जंगलों में चले गए। तीन साल तक तपस्या में लगे रहे। उनकी साधना देख मां लक्ष्मी प्रकट हुईं और बोलीं, ‘मैं आपसे बहुत खुश हूं। मेरा आपको आशीवार्द है कि आज के बाद आपका वंश आपके ही नाम से जाना जाएगा।’ इसीलिए तब से अग्रवाल समाज मां लक्ष्मी की भी पूजा करता रहा है। लक्ष्मी ने ही उनको दोबारा राज वापस लेने में भी मदद की थी। उन्होंने अग्रोहा को राजधानी बनाया। 108 साल तक राज किया। अंत में बेटे विभू को राजकाज सौंप वन में साधना के लिए चले गए। इनके 18 बेटे थे। इनकी दीक्षा अलग अलग गुरुआें ने की। इन्हीं गुरुआें के नाम पर आगे चलकर 18 गोत्र बने जो आज भी कायम हैं। यह उन्हीं का नियम था समान गोत्र वाले आपस में शादी नहीं करेंगे। यह परंपरा आज भी कायम है। अग्रसेन जी ने ही सबमें समानता का भाव भरा था। दान देने की अपील की। उनका बनाया राह ही है जिसपर चलते हुए आज भी अग्रवाल कम्युनिटी स्कूल, मंदिर, धर्मशाला, प्याऊ आदि बनाने या बनवाने में आगे रहता है।
-तिलकराज गुप्ता, प्रधान कपूरथला अग्रवाल सभा
तिलक राज गुप्ता
जयंती के उपलक्ष्य में की तैयारियो संबंधी बैठक को संबोिधत करते हुए अग्रवाल सभा के अध्यक्ष तिलक राज अग्रवाल