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आम आदमी और उसकी आम तकनीक में असीमित ताकत है

6 वर्ष पहले
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दिल्ली में आम आदमी ने शनिवार को केजरीवाल और किरण बेदी का भाग्य लिख दिया। 70 सीटों वाली विधानसभा के पिछले चुनाव को कोई भूल नहीं सकता। तब 16 सीटों पर जीत का अंतर बेहद कम था। यही आम आदमी और उसकी आम तकनीकी की ताकत है। नेता आम आदमी की इस ताकत को जानते हैं। वे उनके शक्तिशाली टूल इंटरनेट से भी बखूबी परिचित हैं। ये दो कहानियां बताती हैं कि आम आदमी और उसका टूल कैसे परिवर्तन ला सकता है।

पहली कहानी : वसंत दाबोले मुंबई पुलिस में एसीपी हैं। इसलिए रुतबा भी है। छवि भी सख्त। समाज कल्याण विभाग से उन्हें इसलिए हटा दिया गया, क्योंकि कुछ लोगों से वह कुछ ज्यादा ही सख्ती से पेश आए थे। लेकिन वहां भी उन्होंने कई रिकॉर्ड बनाए। उन्होंने आम आदमी की तकनीक से ही काम किया और अपने विभाग को ऐसे नतीजे दिए, जिन पर उनके पिछले अधिकारियों ने ध्यान नहीं दिया था। दाबोले ने गुमशुदा लोगों की तलाश के लिए सोशल नेटवर्क पर अपने 10,000 फॉलोअर्स को अलर्ट किया। महाराष्ट्र में 14,400 लोग गुमशुदा हैं। इनमें 7400 महिलाएं और 1623 बच्चे शामिल हैं।

दाबोले ने अपने फॉलोअर्स से भीख मांगने वाले बच्चों-बड़ों सबके फोटो क्लिक कर सोशल नेटवर्क पर उनके पेज पर अपलोड करने की अपील की। उन्होंने ट्रैफिक सिग्नलों पर लगे सीसीटीवी फुटेज खंगाले। फिर अपने विभाग से उन सभी तस्वीरों को गुमशुदा लोगों की तस्वीरों से मिलाने को कहा। यह काम चेहरे पहचानने वाले सॉफ्टवेयर से किया गया। तकनीक काम आई। सकारात्मक नतीजे मिले। उन्होंने मात्र 90 दिनों में ऐसे 1862 लोगों को ढूंढ़ निकाला जो 10 साल से गुम थे। यह उस विभाग के बनने के बाद अब तक का सबसे अच्छा रिकॉर्ड रहा।

दूसरी कहानी : अहमदाबाद में एक आम आदमी के गुस्से ने पूरे नगर निगम को हिलाकर रख दिया। 53 साल के अतुल भावसर शुक्रवार दोपहर 2 बजे निगम के दफ्तर पहुंचे। उन्हें एस्टेट डिपार्टमेंट में एक आरटीआई दायर करनी थी। उनसे कहा गया कि अधिकारी 2.30 बजे लंच के बाद मिलेंगे। वह इंतजार करते रहे। 2.40 बज गए। अधिकारी नहीं पहुंचे। भावसर से रहा नहीं गया। उन्होंने फिर पूछा तो कहा गया कि 2.45 बजे तक इंतजार करो। फिर जब 2.45 बजे भी अधिकारियों ने शक्ल नहीं दिखाई तो भावसर ने मेयर को कॉल किया। स्टाफ के मौजूद होने की शिकायत की। मेयर मीनाक्षी ने उनसे वहीं रहकर इंतजार करने को कहा और भरोसा दिलाया कि वह 10 मिनट में पहुंच रही हैं।

मीनाक्षी 7-8 मिनट में ही वहां पहुंच गईं। भावसर के पास जाकर पूछा, ‘क्या आपने ही मुझे फोन किया था।’ उनके हां कहने के बाद विभाग का अटेंडेंस रजिस्टर उठाया और अधिकारियों के नाम पुकारने लगीं। तब तक स्टाफ के सिर्फ दो लोग पहुंचे थे। लेकिन उन दोनों में वह अधिकारी नहीं था जिससे भावसर मिलना चाहते थे। 3 बज चुके थे। जब लोगों ने मीनाक्षी की रोल कॉल सुनी तो खबर फैल गई और 5 मिनट में ही स्टाफ हाजिर हो गया। फिर जो हुआ, उसे पूरा स्टाफ कभी भूल नहीं सकता।

फंडा यह है कि...

आम आदमी इतना ताकतवर है कि ठान ले तो भ्रष्टाचार के किलों की बुनियाद हिला दे, शासक बदल दे। इसी तरह आम आदमी की सोशल नेटवर्किंग जैसी टेक्नोलॉजी सामाजिक मुद्दों के लिए और भी ज्यादा शक्तिशाली है। इतनी कि इस ताकत से वो काम हो सकते हैं जो सरकार के शक्तिशाली विभागों के लिए गले की हड्‌डी बन जाते हैं।