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किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी जांच के आधार पर ही की जाए : सेशन जज
जिलाकानूनी सेवाएं अथारिटी की ओर से पुलिस अधिकारियों को धारा-498-ए (ससुराल परिवार द्वारा उत्पीड़न) तथा सात साल की सजा तक के अपराधों के मामलों में गिरफ्तारी के संबंध में वर्कशाप लगाई गई। माननीय सर्वोच्च न्यायालय की ओर से उक्त मामलों में गिरफ्तारी को तर्कसंगत बनाने के लिए दिए गए निर्देशों के बारे में पुलिस के अधिकारियों को बताया गया।
वर्कशाप को संबोधित करते हुए जिला एवं सेशन जज बीके मेहता ने कहा कि सर्वोच्च न्यायलय की ओर से अरुणेश कुमार वर्सेज स्टेट आफ बिहार के मामले में दिए गए निर्देशों का पालन करने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय दंड संहिता में जिन भी अपराधों के लिए सात साल तक की सजा का प्रावधान है उनमें किसी भी व्यक्ति को केस दर्ज करने के बाद हिरासत में लेने या लेने की जरूरत के संबंध में सभी कानूनी कार्रवाइयों को पूरा किया जाना चाहिए।
उन्होंने उक्त मामले का हवाला देते हुए कहा कि आरोपी की गिरफ्तारी सिर्फ उस पर लगाए गए आरोपों के आधार पर नहीं की जा सकती, जब तक कि पुलिस अधिकारी जांच के दौरान उस पर लगाए गए आरोपों की संजीदगी तर्कसंगत तक नहीं पहुंच जाता। उन्होंने कहा कि इस तरह सात साल तक की सजा के अपराधों में गिरफ्तारी उचित पड़ताल के लिए या फिर आरोपी को और अपराध करने से रोकने के लिए उसके द्वारा जांच को प्रभावित करने के लिए होनी चाहिए।
इसी तरह धारा-498-ए के तहत भी गिरफ्तारी से पहले पुलिस अधिकारियों को सुप्रीमकोर्ट की ओर से निर्धारित निर्देशों को ध्यान में रखना चाहिए।
इस दौरान एसएसपी सनमीत कौर ने भरोसा दिलाया कि पुलिस की ओर से सुप्रीम कोर्ट द्वारा गिरफ्तारी के संबंध में जारी किए गए दिशानिर्देशों का ध्यान रखा जाएगा।
इस मौके पर एडीशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सैशन जज नीलम अरोड़ा, एसपी (डी) दिलबाग सिंह पन्नू, सहायक कमिश्नर गीतिका सिंह, सिविल जज सीनियर डिवीजन बीपी सिंह, सैक्रेटरी जिला कानूनी सेवा अथारिटी कम सीजेएम शिखा गोयल, सीजेएम गुरप्रीत कौर, एडीशनल सिविल जज सीनियर डिवीजन मनप्रीत कौर, एडीशनल सिविल जज सीनियर डिवीजन राजेश आहलूवालिया, सिविल जज जूनियर डिवीजन हिमांशु अरोड़ा आदि मौजूद रहे।
वर्कशाप को संबोधित करते हुए जिला सेशन जज बीके मेहता। साथ में हैं एसएसपी सनमीत कौर अन्य।