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इतिहास, फिल्म और आहत भावनाओं का सवाल

5 वर्ष पहले
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पद‌्मावती फिल्मके बहाने जो विवाद उठा है उसने फिर साबित किया है कि भारत में संविधानवाद गहरे तनाव में है और राज्य की भूमिकाएं समाज के गैर-जिम्मेदार लोगों ने अपने हाथ में ले ली हैं। उससे भी बड़ी बात यह है कि फिल्मी जगत के कलाकार और लेखक, इतिहास और मिथक के साथ अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर घालमेल कर रहे हैं। संविधान में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश लगाने के लिए अपवाद दिए गए हैं और वे आधार तय करने के लिए सेंसर बोर्ड से लेकर अदालतें तक हैं। किंतु राज्य के समानांतर सामाजिक स्तर पर तमाम संगठन हैं, जो आहत भावनाओं के नाम पर इतिहास, मिथक और कला को सेंसर करने पर आमादा हैं। इसमें कई बार राज्य की सहमति भी होती है और कई बार राज्य लाचारी से उन लोगों की हिंसक गतिविधियों को निहारता रहता है। उससे कम चिंताजनक बात यह नहीं है कि जो लोग इतिहास के नाम पर फिल्म बना रहे हैं वे उसमें कल्पना का तत्व डालकर उन मिथकों से खेलने की कोशिश कर रहे हैं जो लोगों के मानस में रूढ़ हो गए हैं। इतिहासकार नजफ हैदर का यह कथन उचित ही है कि संजय लीला भंसाली अगर ऐतिहासिक फिल्म बना रहे हैं तो उसमें मिथक का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं और अगर मिथकीय फिल्म बना रहे हैं तो इतिहास का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं। उनकी सारी दिक्कत यहीं उत्पन्न होती है। समाज के इतिहास और मिथक का अपने व्यवसाय के लिए रचनाशीलता के नाम पर दोहन करने वाले फिल्मकार नहीं समझ रहे हैं कि यह समाज इतिहास और संविधान जैसे गंभीर विषयों को स्वीकार करने को तैयार नहीं है तो उनकी भावनाओं को आहत करने वाली फिल्म कैसे स्वीकार करेगा? यह भारतीय लोकतंत्र का गंभीर संकट है, जिसका समाधान आसान नहीं है। यह तभी संभव है जब समाज और राज्य नागरिक अधिकारों को कुचलने की बजाय उसके अनुरूप अपने दायित्यों का निर्वाह करें। दूसरी तरफ समाज के पढ़े-लिखे लोग फेसबुक, ट्विटर का इस्तेमाल झूठी खबरों के आधार पर भावनाएं भड़काने की बजाय तर्क, तथ्य और विवेक के प्रचार में लगाएं। निश्चित ही हम पोस्ट- ट्रुथ सोसायटी की ओर बढ़ रहे हैं जहां सच क्या है उसे पता करने की बजाय जाति, धर्म और चिढ़ के आधार पर आहत भावनाओं की राजनीति चल रही है और समाज का बेहद खंडित चरित्र उभर रहा है।

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