• अलग बनकर दिखाना खुद को पूरी तरह झोंक देने की कहानी है

अलग बनकर दिखाना खुद को पूरी तरह झोंक देने की कहानी है / अलग बनकर दिखाना खुद को पूरी तरह झोंक देने की कहानी है

Samana News - स्टोरी 1 : जनवरी2017 में आयोजित स्टैंडर्ड चार्टर्ड मुंबई मैराथन से 32.93 करोड़ रुपए का फंड एकत्रित हुआ, जो पूर्व में...

Apr 10, 2017, 03:30 AM IST
अलग बनकर दिखाना खुद को पूरी तरह झोंक देने की कहानी है
स्टोरी 1 : जनवरी2017 में आयोजित स्टैंडर्ड चार्टर्ड मुंबई मैराथन से 32.93 करोड़ रुपए का फंड एकत्रित हुआ, जो पूर्व में एकत्रित सारे फंड से अधिक है। इस साल 20 हजार से ज्यादा दानदाताओं ने योगदान दिया, जिसके कारण पिछले साल का 28.14 करोड़ रुपए का आंकड़ा पार हो गया। हर साल होने वाली एशिया की इस सबसे बड़ी मैराथन स्पर्द्धा में इस साल 42 हजार लोगों ने भाग लिया था। इस दौरान 281 गैर-सरकारी संगठनों, 151 कॉर्पोरेट और 912 लोगों ने व्यक्तिगत स्तर पर मैराथन के दौरान विभिन्न प्रकार के चैरिटी कार्यों के लिए पैसा इकट्‌ठा किया।

उस विशाल समूह में एक व्यक्ति जरा अलग था। उसने 1.25 करोड़ रुपए इकट्‌ठे किए। इतना पैसा इकट्‌ठा करना उनकी खासियत नहीं है। जल्दबाजी में उनका यह आकलन करने की गलती मत कीजिए कि वे जरूर पैसे वाली कोई ख्यात शख्सियत होंगे। वे एक साल पहले ही जून से तैयारी शुरू कर देते हैं। वे संभावित दानदाताओं की सूची तैयार कर उनके द्वारा भरे जाने वाले दस्तावेज तैयार करते हैं, उन्हें ई-मेल करते हैं और मैराथन शुरू होने तक उनसे संपर्क बनाए रखते हैं।

हर साल ये नॉन-मुंबईकर फंड इकट्‌ठा करने मुंबई की यात्रा करते हैं ताकि तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले में अपंगों का पुनर्वास कार्यक्रम चलाया जा सके। वहां वे ‘अमर सेवा संगम: वैली फॉर डिसेबल्ड’ चलाते हैं। कुछ बच्चों के साथ शुरू हुई यह संस्था अब तिरुनेलवेली जिले के 900 गांव के 15 हजार विकलांगों को कई तरह की सुविधाएं उपलब्ध करा रही है। मुख्य उद्‌देश्य इन बच्चों के पुनर्वास, शिक्षा और सशक्तीकरण पर ध्यान केंद्रित करना है। इन बच्चों के लिए सारी सुविधाएं नि:शुल्क हैं। 1992 मंे शुरू किए गए इस नियमित स्कूल में ज्यादातर बच्चे पोलियो, मानसिक रोग और रीढ़ की चोट से प्रभावित हैं। ऐसी सुविधाएं देश में सिर्फ तीन स्थानों पर हैं, उनमें यह संस्था भी शामिल है।

वे अपने लिए दो मुख्य पैमाने तय करते हैं : हर साल फंड इकट्‌ठा करने के बेहतर लक्ष्य के लिए मुंबई स्थित कंपनियों और व्यक्तियों से सघन नेटवर्क स्थापित करना और मैराथन दौड़ना। काम और जीवन में उन्होेंने खुद को लगातार चुनौती दी है। मैं इसलिए ऐसा लिख रहा हूं, क्योंकि इस श्रेणी के लोग आमतौर पर 2.4 किलोमीटर की मैराथन दौड़ते हैं। लेकिन, ध्यान आकर्षित करने के लिए और अधिक पैसा इकट्‌ठा करने की दृष्टि से वे 6 किलोमीटर का ड्रीम-रन पूरा करते हैं।

शंकर रमन से मिलिए, जिनमें 8 वर्ष की उम्र में ही मस्क्युलर डिस्ट्रॉफी के लक्षण पाए गए थे। यह ऐसी बीमारी होती है,जिसमें मांसपेशियां ढीली पड़ने लगी है और किसी तरह की शारीरिक हलचल मुश्किल होती जाती है। वे तब कक्षा तीसरी में थे और तभी से व्हील चेयर पर सीमित होकर रह गए हैं। लेकिन, यह मजबूरी उन्हें 1985 में अपनी सीए फर्म स्थापित करने से नहीं रोक पाई। साल-दर-साल वे मैराथन में इसलिए भाग लेते हैं ताकि विकलांग व्यक्तियों की उपलब्धियों को रेखांकित कर सकें। ऐसे लोगों के लिए वे दया या सहानुभूति की बजाय अवसर और अन्यों की तरह काम करने का उचित स्तर चाहते हैं। उनके काम से जाहिर है कि उन्हें अपने उद्‌देश्य में सफलता मिली है।

स्टोरी2 : नौवर्ष की उम्र में उसे कोलकाता में काम करने के लिए भेजा गया था, जहां एक वाचमैन ने उसके साथ दुराचार किया। उसके बाद उसने जिस महिला से मदद मांगी उसने उसे वेश्यालय में बेच दिया, जहां वह दो साल तक रहने को मजबूर हुई, जब तक उसे पुलिस ने उसे नहीं छुड़ा लिया। वहां वह खिड़की से स्कूल जाने वाले बच्चों को देखती पर खुद कभी नहीं जा पाई। आज 25 वर्ष की उम्र में वह लॉ कॉलेज में प्रवेश के लिए परीक्षा की तैयारी कर रही है ताकि वह विधि व्यवस्था के भीतर रहकर उसे बदल सके और यौन अपराधियों को कानून के कठघरे में ला सके यानी वह भविष्य की वकील है।

भला हो डच संगठन के भारतीय कार्यालय द्वारा चलाए जाने वाले कार्यक्रम ‘फ्री गर्ल’ का, जिसका उद्‌देश्य देह व्यापार से बचाकर लाए बच्चों को कानून की पढ़ाई में लगाना है। ‘संलाप’ नामक संगठन ने उसे बचाया था और उसी ने उसे पढ़ाई के लिए नामांकित किया है। वह अकेली नहीं है बल्कि उसके जैसे कई बच्चे हैं, जो इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल हो रहे हैं। ‘फ्री गर्ल’ कानून की पूरी पढ़ाई में उन विद्यार्थियों को आर्थिक के साथ, आवास और व्यक्तिगत जरूरतें पूरी करने में सहायता देगा ताकि वे एक नई जिंदगी का सामना करने लायक बन सकें।

फंडा यह है कि जिंदगीमोड़ लेती रहती है अच्छा या बुरा, मानव निर्मित अथवा कोई अन्य। आपको अलग बनकर दिखाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है, खुद को झोंकना पड़ता है और यह आसान नहीं है।

एन. रघुरामन

मैनेजमेंटगुरु

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मैनेजमेंट फंडा

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