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नीतिगत का सुपरिणाम

7 वर्ष पहले
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जम्मू कश्मीरमें आतंकवादी हमलों और अलगाववादियों के चुनाव बहिष्कार के आह्वान के बावजूद तीसरे चरण में 58 फीसदी मतदान यह बताता है कि चुनाव को लेकर लोगों का नज़रिया बदला है। नियंत्रण रेखा के नजदीक उरी में सेना का जो शििवर हाल में आतंकवादियों से मुठभेड़ का साक्षी बना था, उससे कुछ ही दूर स्थित मतदान केंद्र पर सैकड़ों लोग वोट डालने के लिए कतार में लगे थे। गौरतलब है कि घाटी के इन क्षेत्रों में पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में 9 फीसदी ज्यादा मतदान हुआ है, जबकि लोकसभा चुनाव के दौरान यहां सिर्फ 25 फीसदी मतदान हुआ था। हालांकि, यह बदलाव यूं ही नहीं आया है। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी काफी जमीनी काम करने के बाद 2002 में राज्य में विधानसभा चुनाव करवाने का निर्णय ले सके थे। फिर मनमोहन सिंह को भी अपने पहले कार्यकाल के अंतिम दौर में इस संकटग्रस्त राज्य में चुनावों का सामना करना पड़ा था। इससे जाहिर होता है कि किसी मसले पर लंबे समय तक एक ही नीति पर चलकर किस तरह अनुकूल परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। मतदान का तीसरा दौर सफल रहा, तो सोमवार को श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में प्रधानमंत्री मोदी का भाषण निर्विघ्न संपन्न हो गया। उन्हें सुनने काफी लोग जुटे थे। उमर अब्दुल्ला का आरोप है कि इनमें से काफी लोगों को बाहर से लाया गया था। यदि यह आरोप भी सच है तो यह संकेत तो मिलता ही है कि घाटी में आतंकवादी कमजोर पड़ गए हैं। क्या मोदी के इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत के नारे ने लोगों में कोई उम्मीद जगाई है, यह तो समय ही बताएगा। राज्य में आबादी का चरित्र भी बदला है। भाजपा घाटी में कोई सीट हासिल कर ले तो अचरज नहीं। वहीं, जम्मू में पीडीपी का भी आधार है। लोकतंत्र की दृष्टि से यह अच्छी बात है, क्योंकि कई तबके राज्य को जम्मू, कश्मीर लद्‌दाख में विभाजित करके देखते रहे हैं और आशंका जताते रहे हैं कि केंद्र में नई सरकार के चलते यह विभाजन और पुख्ता होगा। अब सारा दारोमदार राजनीतिक दलों की परिपक्वता पर निर्भर है कि वे चुनाव के सकारात्मक घटनाक्रम को चुनाव तक ही सीमित रखते हैं या दूरगामी परिणाम हासिल करने के लिए काम करते हैं।

संपादकीय