सत्संग को जीवन में उतारें : साध्वी
एसएसजैन सभा संगरूर के प्रवचन हॉल में साध्वी चंदना ने कहा कि हमारे महापुरुषों ने तीन बार एक बात को कहा- सुनो! सुनो! सुनो!, क्या सुने, क्यों सुने, किसलिए सुनें। सुनने से ही पता चलता है कि कौन सा रास्ता सही है गलत है, सुनने से ही हमारे जीवन का कल्याण होता है। पंजाबी में कहावत है सुन-सुन अंधे पै गए राह-सुन कर ही अंधे सही रास्ते पर चल देते हैं।
भगवान महावीर ने कहा है कि जो दिल से सुनता है वही सच्चा श्रोता है। आजकल व्यक्ति क्या सुनता है- टीवी, मोबाइल को सुनता है लेकिन भगवान ने एक शब्द दिया श्रुत, इसका मतलब है भगवान की वाणी को सुनना, तत्व के ज्ञान को सुनना। यह श्रुत हमें सत्संग में जाकर ही मिल सकता है। सत्संग की तो आधी घड़ी ही बहुत है जैसे फसल खड़ी करने से पहले बारिश का मूल्य है उसी प्रकार सत्संग की आधी घड़ी यदि जीवन में उतार लें तो वही बहुत है। कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया यदि उसमें से कुछ ले लिया जाए तो जीवन का कल्याण हो जाएगा। केवल एक श्रोता के लिए कृष्ण ने गीता लिखी तो यदि एक श्रोता ही सत्संग में से कुछ ले जाए तो सत्संग सुनना सार्थक हो जाएगा। सुन-सुन कर ही जीवन बदलेगा इसलिए हमें सुनना है क्या सुनना है- भोगों के त्याग की चर्चा। ये भोग तो क्षणिक सुख देते हैं।