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शहर में नहीं नजर रहे हैं कौए, कैसे तृप्त होंगे पितर
हिंदूशास्त्रों के अनुसार श्राद्ध में पंडितों के साथ कौए को खाना खिलाने से ही पितर तृप्त होते हैं परंतु अब कौए गायब से हो गए हैं। शहर में इन दिनों कौए को खाना खिलाने के लिए लोगों को आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में जाना पड़ रहा है।
भारत ज्ञान विज्ञान समिति के राज्य कमेटी सदस्य राज कुमार गर्ग का कहना है कि पशुओं को लगाए जाने वाले इंजेक्शन, पेड़ों की कटाई और चूहों की दवा का प्रयोग होने से कौए लुप्त होते जा रहे हैं क्योंकि जिन पशुओं को इंजेक्शन लगाए जाते हैं उनके मरने के बाद कौए उनका मांस खाते हैं। इस मांस के कारण इनकी प्रजाति खत्म होती जा रही है। साथ ही फसलों पर पेस्टिसाइड दवाओं का छिड़काव भी इनके कम होने का मुख्य कारण है। पहले समय में लोग खाना खाते समय कुछ खाना कौए के लिए रख देते थे परंतु आधुनिकीकरण के युग में यह रिवाज लगभग खत्म हो गया है इसलिए कौओं ने भी अपना ठिकाना कहीं और ढूंढ लिया है। हर घर में यह चिंता बनी हुई है कि यदि कौए को खाना नहीं खिलाएंगे तो पितरों को तृप्ति कैसे मिलेगी। शास्त्रों के अनुसार आज भी कौए को खाना दिए बिना श्राद्ध पूरा नहीं समझा जाता है। जीव विज्ञान के अनुसार श्राद्ध कौए की प्रजनन ऋतु है। खुराक की चिंता को लेकर पुराने समय में पूर्वजों ने इनका संबंध श्राद्ध से जोड़ दिया। लोग इन्हें अपने पूर्वजों का संदेशवाहक मानकर पितरों के नाम से निकाले गए खाने को परोसें। जिससे प्रजनन के दिनों में इनकी खुराक का प्रबंध हो सके।