रात 10 से सुबह 4 बजे तक होती थी रामलीला
प्रस्तुति : अनिल शर्मा
गुजरा हुआ जमाना भी क्या जमाना था। जलियांवाला बाग की रहने वाली हाउस वाइफ जानकी देवी बताती हैं कि बात करीब 50 साल पहले की है। उन दिनों गांवों या कस्बों में तो टीवी थे और ही सिनेमाघर। मनोरंजन के नाम पर रेडियो किसी किसी के पास होता था, लिहाजा राजा-रानी और जादूगर तथा तोते की कहानियां बड़े बुजुर्गों से सुनने को मिलती थीं। उस समय वह जिला तरनतारन के पास चुताला गांव में रहते थे। मौसम के बदलाव के साथ नवरात्रों में तरनतारन में रामलीला का आयोजन किया जाता था। दूर-दूर के गांवों कस्बों से लोग रामलीला देखने जाते थे। उनके गांव से भी लड़कियों की टोली घर की बड़ी बुजुर्ग महिलाओं के साथ रामलीला देखने हर रोज तरनतारन जाती थी। रामलीला रात दस बजे शुरू होती थी लिहाजा सभी लड़कियां गांव से शाम 6 बजे ही पैदल तरनतारन की ओर चल पड़ती थी। रास्ते में इक्का -दुक्का तांगे वाले या साइकिल सवार लोग अपनी मंजिल की ओर जाते नजर आते थे।
उस जमाने के हाकिम बहुत सख्त थे, लिहाजा कानून के डंडे के डर से किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि कोई लड़कियों या महिलाओं के साथ किसी तरह की गलत हरकत कर सके। तरनतारन पहुंचते ही रामलीला वाली जगह पर जाकर सभी लड़कियां अपनी-अपनी सीट पर बैठ जाती थीं। रात 10 बजे रामलीला शुरू होती थी, जो सुबह चार बजे तक चलती थी। रामलीला देखकर सुबह 5 -6 बजे सभी गांव की ओर लौट जाती थी। आज भी वह दिन याद आते हैं तो गुजरा वक्त आंखों के आगे खड़ा नजर आता है।