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फूलों के बीजों की खेती से चार गुणा बढ़ाई किसानों की आमदनी

5 वर्ष पहले
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क्रॉपडाइवर्सीफिकेशन यानि फसली चक्र को तोड़ना। इस ओर सरकारें तो कुछ खास नहीं कर सकीं। लेकिन, डॉ. अल्लाह रंग की मेहनत रंग ला रही है। पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी लुिधयाना समेत कोस्टारिका, मलेशिया जैसे देशों की यूनिवर्सिटियों में फसलों के उन्नत बीज तैयार करवाने की पढ़ाई करवा चुके डॉ. अल्लाह रंग ने क्रॉप डाइवर्सीफिकेशन की जिद की। आलम यह है कि नाभा रोड पर छोटे से गांव धबलान से क्रॉप डाइवर्सीफिकेशन की शुरुआत करने वाले डॉ. रंग अपने साथ लगभग 80 किसानोंे को जोड़ चुके हैं। यह किसान डॉ. रंग के साथ कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग के तहत करीब 500 एकड़ रकबे में फूलों के बीज तैयार करने के धंधे से जुड़े हैं।

खुद डॉ. रंग करीब 100 एकड़ में फूलों के बीज तैयार करके पॉलैंड, जर्मनी, यूके और फ्रांस में एक्सपोर्ट कर रहे हैं। वह और उनके साथ जुड़े किसान फूलों के बीजों की करीब 180 किस्मे एक्सपोर्ट कर रहे हैं जिसका रेट 150 से लेकर दस हजार रुपए प्रति किलो तक है। प्रमुख किस्मों में डेजी, क्लीक्रिया, डॉग फ्लॉवर, कैलनकुल्ला और क्लोम शामिल हैं। काॅन्ट्रेक्ट फार्मिंग से जहां किसानों की आमदनी चार गुणा तक बढ़ी है वहीं, गांव धबलान और आसपास के गांवों की घरेलू महिलाओं को भी साल में छह महीने तक पांच हजार रुपए मासिक की आमदनी होने लगी है।

मुनाफा चार गुणा ज्यादा| डॉ.रंग ने बताया, गेहूं और धान के फसली चक्र से जुड़ा किसान साल में सारे खर्च निकाल कर प्रति एकड़ 20 से 25 हजार रुपए का मुनाफा कमाता है। वहीं, चार से पांच महीने में होने वाली फूलों के बीजों की खेती में सभी खर्चे निकाल कर प्रति एकड़ 80 हजार से एक लाख रुपए के बीच मुनाफा होता है। चूंकि पंजाब में पांच एकड़ से कम रकबे में खेती करने वाले छोटे किसान हैं तो मुनाफे के लिहाज से फूलों के बीजों की खेती ज्यादा फायदेमंद है। फूलों के बीजों की खेती सर्दियों में होती है तो ऐसे में सीजन के दौरान गेहूं की फसल को रिप्लेस किया जा सकता है। उसके बाद धान के सीजन में बासमती की किस्म 1509 या पीआर 121 अपनाने की ऑप्शन है जो 100 दिन के भीतर तैयार हो जाती है। किसानों को आकर्षित करने के लिए डॉ. रंग किसानों को पनीरी मुफ्त में मुहैया करवाते हैं। कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग के तहत डॉ. रंग से लोहटबद्दी (लुधियाना), गिद्दड़ानी (संगरूर) और गांव भेड़पुरी (पटियाला) के किसान जुड़े हैं।

1997 से बड़े ऑर्डर| बड़ेऑर्डर मिलने की शुरुआत 1997 में हुई। तब ऑर्डर पूरे करने के लिए इच्छुक किसानों से कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग के तहत जुड़े। पहला ऑर्डर 25 किलो के ऑर्डर से शुरुआत की और अब सालाना 1800 क्विंटल बीज एक्सपोर्ट कर रहे हैं। यह बीज हॉलैंड, पोलैंड, जर्मनी, फ्रंास, यूके, यूएसए, ओमान, दुबई, इरान और तुर्की आदि देशों को एक्सपोर्ट किए जा रहे हैं।

असफलता भी मिली| साल1993 में धबलान में ही पैतृक जमीन पर फूलों के बीजों का प्रोजेक्ट शुरू किया। पहला ऑर्डर 25 किलो बीज सप्लाई करने का था। चूंकि बीज तैयार करने को लेकर अनुकूल मौसम, खाद डालने और कीटनाशक जैसे तकनीकी पहलुओं की जानकारी नहीं थी तो शुरुआत में असफलता भी मिली। इसके बाद खुद ही तजुर्बे करके सफल होने का सिलसिला शुरू हुआ।

डॉ. रंग बताते हैं, लुिधयाना यूनिवर्सिटी में टीचिंग के दौरान क्रॉप डाइवर्सीफिकेशन की चाहत उनके मन में थी। गेहूं और धान की उन्नत किस्मों के बीज तैयार करने में माहिर तो थे ही, साथ ही फूलों के बीज तैयार करने का प्रोजेक्ट भी शुरू कर दिया।

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