पिता की सलाह से सीन में आई भावुकता
बम ब्लास्ट की सूचना के बाद भी जारी रखी रामलीला
श्रीरामलीलाकमेटीराघोमाजरा से नरेश खन्ना को 1971 में भगवान राम का रोल निभाने का अवसर मिला। पिता डायरेक्टर थे। तो रोल और अच्छा निभाने का दबाव भी था। लक्ष्मण मूर्छित का दृश्य था, ऐसे में राम की भावुकता सबके सामने लानी जरूरी थी। ऐसे में साथियों ने राय दी कि आंखों में कोई ऐसी चीज डालों जिससे आंखों में आंसू जाए।
डायरेक्टर पिता को गवारा नहीं था। ऐसे में उन्होंने बेटे नरेश खन्ना को सुझाव दिया कि जिस समय लक्ष्मण मूर्छित अवस्था में होंगे तो समझना कि यह सगे भाई की लाश पड़ी है। नरेश खन्ना ने सीन में ऐसा ही किया, आंसू सिर्फ नरेश खन्ना के ही आंखों में ही नहीं बल्कि रामलीला देखने आए दर्शकों में भी दिखे। आज भी नरेश खन्ना जब उस दृश्य को याद करते हैं तो आज भी उनकी आंखों में आंसू बहने लगते हैं। नरेश खन्ना ने बताया कि राघोमाजरा में रामलीला 1962 से शुरू हुई, जोकि 2014 तक लगातार चलती रही है। रामलीला का आयोजन करने वाली उनकी तीसरी पीढ़ी है, और भगवान राम की कृपा से आगे भी इसी तरह रामलीला का आयोजन चलता ही रहेगा। उन्होंने बताया कि 80 का दशक पंजाब में आतंकवाद का था। इस दौरान रामलीला का आयोजन करना बहुत मुश्किल था।
रामलीला के आयोजन के बारे में जानकारी देते आयोजककर्ता। उन्होंने पहले आज के आयोजन के बारे में बताया।
1971 में रामलीला मंचन के दृश्य।
डीसी से अपील
आयोजकोंने डीसी से अपील की है कि कृपया देर रात तक रामलीला का मंचन होने दें। जिससे कि इस परंपरा को जिंदा रखने में मदद मिल सके।
दिल में हर समय आतंकी खतरे का डर रहता था, लेकिन दिल में निरंतर रामलीला का आयोजन करना था, तो किसी भी साल रामलीला का मंचन नहीं रोका गया। 84 के दशक में जब रामलीला का मंचन किया जा रहा था तो अचानक बीएसएफ, सीआरपीएफ पंजाब पुलिस की गाडिय़ां ग्राउंड में पहुंची। उस समय प्रधान नित्यानंद शर्मा हुआ करते थे। पुलिस अधिकारी उन्हें अलग जगह पर ले गए, और चुपके से उनके कानों में कहने लगे कि ग्राउंड में बम ब्लास्ट की सूचना मिली है, इसलिए हो सके तो दिन में ही रामलीला का मंचन करवा देना। उस दिन उन्होंने पहले शहर में अनाउंसमेंट करवाया और सांय 7 बजे रामलीला खत्म करा दी।
रामायण सिखाती है मर्यादा चरित्र का पाठ
आयोजकरामदास सैणी रमेश कौशल कहते हैं कि रामायण से लोगों को बहुत कुछ सीखने