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तब लोग सीता को दहेज भी देते थे

7 वर्ष पहले
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{24 से वीर हकीकत राए ग्राउंड में रामलीला

सोबनगुंसाई| पटियाला

वक्तबेशकतेजी से बढ़ गया, लेकिन इस शहर में रामलीला आज भी उसी शिद्दत के साथ मंचित हो रही है। लोग अब बहुत कम ही रामलीला कमेटियों की श्रीरामलीला के प्रति दिलचस्पी दिखाते हैं।

कुमाऊं सभा की रामलीला के डायरेक्टर खीमानंद सनवाल बताते हैं कि उत्तराखंड से पंजाब आने के बाद उन्होंने 1960 में ही रामलीला का आयोजन करना शुरू कर दिया था। उस समय टीवी भी नहीं हुआ करता था। अपनी संस्कृति जीवित रखने के लिए उन्होंने श्रीरामलीला का आयोजन करना शुरू कर दिया। खीमानंद सनवाल कहते हैं कि रामलीला का आयोजन करना अब कोई छोटा मोटा काम नहीं रहा। सबसे बड़ी समस्या रामलीला में पात्रों का चयन की है। पहले एक पात्र के लिए पांच लोग खड़े होते थे, उनमें से प्रतियोगिता के जरिए एक सही पात्र का चयन किया जाता था। अब पात्र ढूंढने से नहीं मिलते। इसके बाद दूसरी समस्या जिला प्रशासन की जोर जबर्दस्ती है। सबसे बड़ी परेशानी खराब होते माहौल की है, इसलिए पहले जहां रात 2 बजे तक रामलीला चलती थी, अब इसे साढ़े 10 बजे ही खत्म करनी पड़ती है।

1983 में आतंकवाद के चलते इन्हें रामलीला बंद करनी पड़ी थी। जिसेे बाद में सबने मिलकर दोबारा साल 1997 में शुरू कराया। कुमाऊं सभा अब पिछले 18 साल से लगातार भगवान श्री रामलीला का आयोजन कर रही है। रामलीला के आयोजक हीरा नाथ गोस्वामी, खीमानंद सनवाल, ललित मोहन शर्मा मोतीलाल शर्मा ने कहा कि उन्हें अपने बुजुर्गों से श्रीरामलीला के आयोजन का ज्ञान मिला था, जिसके चलते वह आज भी इस परंपरा को जीवित रखे हैं। रामलीला आयोजकों ने बताया कि रामलीला में एक वो भी दौर था, जब सीता स्वयंवर होता था, लोग सीता को दहेज देने के लिए घरों से निकलते थे। मंच पर साड़ी और बर्तनों का ढेर लग जाता था। बाद में वह पात्र उस दहेज को अपने घर ले जाता था। आज लोगबाग यदा कदा ही रामलीला देखने आते हैं, क्योंकि अब मनोरंजन के बहुत साधन हैं।

1960 से लेकर 1980 वो दौर था, जब लोग रामलीला का बेसब्री से इंतजार किया करते थे। उनदिनों शहर तीन-चार चौक तक ही सिमटा हुआ था और कोई पांच राम लीलाएं हुआ करती थीं। इसलिए कलाकार भी आसानी से पहुंच जाते थे। अब शहर काफी फैल गया और कलाकार भी दूर से आते हैं। खर्च और इसका आकर्षण भी वक्त की रफ्तार में थोड़ा धूमिल हो गया है। भास्कर आपको पुराने किस्सों के