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गुरु की पहचान बाहरी नेत्रों से नहीं: सौम्या

5 वर्ष पहले
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श्रीदुर्गा मंदिर धर्मशाला, भादसों में माता श्री नैना देवी डेवलपमेंट कमेटी की सात दिवसीय श्री रामकथामृत के छठे दिन मंगलवार को सौम्या भारती ने गुरु की पहचान को लेकर, समाज में प्रचलित धारणाओं का वर्णन किया।

साध्वी ने आगे बताया कि गुरु की पहचान उनका बाहरी वेष नहीं, बल्कि उनके पीछे की भीड़ होती है। गुरु तो वह है जो हमारे भीतर ही प्रभु का दीदार करा दे जिससे हमारा रोम रोम कृ़तज्ञ हो जाए। जिसकी शरण में जाते ही व्यक्ति जन्ममरण के बंधन से मुक्त हो जाए। साध्वी ने बताया कि भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है कि तुम मेरा स्वरूप बाहरी नेत्रों से नहीं पहचान सकते हो। इसके लिए तुम्हें तीसरे नेत्र की जरूरत है। जिसके बाद भगवान श्री कृष्ण उनका तीसरा नेत्र खोल देते हैं। कृष्ण उनसे कहते हैं कि मेरे दिव्य स्वरूप की प्राप्ति जप, तप, दान से संभव नहीं है। यह तो केवल दिव्य ज्ञान से संभव है। ज्योति प्रचंड की रस्म नवीन गुप्ता ने अदा की। यहां मनीष पुरी, मनोज वर्मा, राज कुमार गोगना, सिंदर पाल शर्मा, हैप्पी सिंगला, करण गुप्ता मौजूद रहे।

सात-दिवसीय श्री रामकथामृत में साध्वी सौम्या भारती कथा सुनाते हुए।

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