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श्री राम जी की आरती

श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणं नव कंजलोचन, कंज मुख, करकंज, पद कंजारुणं।

Danik Bhaskar | Jan 14, 2015, 02:42 PM IST
आरती का अर्थ है पूरी श्रद्धा के साथ परमात्मा की भक्ति में डूब जाना। भगवान को प्रसन्न करना। इसमें परमात्मा में लीन होकर भक्त अपने देव की सारी बलाए स्वयं पर ले लेता है और भगवान को स्वतन्त्र होने का अहसास कराता है।

आरती को नीराजन भी कहा जाता है। नीराजन का अर्थ है विशेष रूप से प्रकाशित करना। यानी कि देव पूजन से प्राप्त होने वाली सकारात्मक शक्ति हमारे मन को प्रकाशित कर दें। व्यक्तित्व को उज्जवल कर दें। बिना मंत्र के किए गए पूजन में भी आरती कर लेने से पूर्णता आ जाती है। आरती पूरे घर को प्रकाशमान कर देती है, जिससे कई नकारात्मक शक्तियां घर से दूर हो जाती हैं। जीवन में सुख-समृद्धि के द्वार खुलते हैं।

भगवान श्रीराम की आरती

श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणं
नव कंजलोचन, कंज मुख, करकंज, पद कंजारुणं।
कंदर्प अगणित अमित छबि नवनीत नीरद सुंदरं।
पटपीत मानहु तडित रूचि शुचि नौमि जनक सुतावरं।।
भजु दीनबंधु दिनेश दानव दैत्यवंश निकंदनं।
रघुनन्द आनंदकंद कौशलचंद दशरथ नंदनं ।।
सिरा मुकुट कुंडल तिलक चारू उदारु अंग विभूषणं।
आजानुभुज शर चापधर संग्रामजित खरदूषणं ।।
इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनं ।
मम ह्रदय कंच निवास कुरु कामादि खलदल गंजनं।।
मनु जाहिं राचेउ मिलहि सो बरु सहज सुन्दर सांवरो।
करुना निधान सुजान सिलु सनेहु जानत रावरो।।
एही भांति गौरि असीस सुनि सिया सहित हिय हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजी पुनिपुनि मुदित मन मंदिर चली।।