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िसक्कों के बाजार में राजस्थान ने जमाया अपना िसक्का
कहते हैं िसक्कों की जुबान नहीं होती, लेिकन हर िसक्के के साथ उसका इितहास बोलता है। ईसा से पूर्व से लेकर मुगलों के शासनकाल के बीच का इितहास िसक्कों के िजक्र के िबना अधूरा है। बेंगलुरू शहर के चंद्रमहल में शुक्रवार से शुरू हुई िसक्कों की प्रदर्शनी में दूर-दूर से लोग अपने चहेते िसक्कों और नोटों को ढूंढने आए। िकसी को िमला तो कोई िनराश रहा। कई लोगों ने घर बैठे ही अपने िसक्के पसंद कर बोली से खरीद िलए। प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए भारतीय िवद्या भवन के चेयरमैन एन रामानुजा ने कहा, िसक्कों, नोटों डाक िटकटों के जानकार कोई इितहासकार नहीं होते, लेिकन इनकी जानकारी इितहास को समृद्ध करने वाली होती है। कई बार खोए हुए इितहास को भी िसक्कों से उजाला िमला है। अध्यक्षता करते हुए एवी नरसिंहमूर्ति ने कहा िसक्के का मूल्य वह नहीं है जो उस पर अंिकत है, बल्कि उससे प्रकट होने वाले इितहास से है। िसक्का अपने शासक की आिर्थक, धािर्मक एवं सांस्कृितक िस्थति का प्रत्यक्ष प्रमाण होता है। प्रदर्शनी में कर्नाटक न्यूिमसमेिटक सोसायटी के अध्यक्ष महेश जंबूिलंगम ने कहा िक भारतीय इितहास को उजागर करने में इितहासकारों से अिधक िसक्कों के संग्रहकर्ताओं का रहा है। िसक्कों के बाजार में शुक्रवार को प्राचीन राजस्थान के िसक्कों को ही उम्मीद से अिधक दाम िमले। आिदमकाल के दुर्लभतम िसक्कों पर मुगल और राजस्थान के शासकों के िसक्के भारी रहे। सबसे अिधक बोली साढे छह लाख की अजमेर सांभर से चौहान शासक िवग्रह राजा चतुर्थ के आधी दीनार पर लगी। बीकानेर महाराजा गंगािसंह की गोल्ड की आधी मोहर सवा लाख में िबकी। मरुधर आर्ट्स के राजेंद्र मारु ने बताया िक इलाहाबाद का सोने का िसक्का एक लाख 90 हजार में और गुलशनाबाद के सुल्तार जहंदरशाह का चांदी का रुपया एक लाख 40 हजार में िबका।