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जाऊं तो जाऊं कहां?

7 वर्ष पहले
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अजमेर. “जिंदगीभर हाड़-तोड़ कर 5 लाख जोड़े। वो भी ये बैंक निगल गया। अब बुढ़ापे में किसके पास जाऊं? मकान मालिक किराया मांगता है, पेट रोटी मांगता है, बुढ़ापा दवा मांगता है।’’ अजमेर अरबन को-ऑपरेटिव बैंक को कंगाली के दरवाजे पर पहुंचाने वाले भले ही मीठी नींद और चुपड़ी रोटी का मजा ले रहे हों, मगर बैंक में अपनी मेहनत की कमाई जमा कराने वाली मधु सोनी जैसे सैकड़ों लाचार आज भी बैंक की देहरी पर खून के आंसू रो रहे हैं।

(विस्तृतसिटी फ्रंट पेज)