जिला प्रमुखों की शिक्षा की स्थिति
युवा हाथों में पंचायतीराज, 37% प्रधान 30 साल तक के
सैकंडरी
9
सीनियर सैकंडरी
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ग्रेजुएट
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पीजी
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^अगर शिक्षा की अनिवार्यता का कानून नहीं बनाते तो राजनीति के चेहरे से अशिक्षा का यह कलंक कभी नहीं मिट पाता। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की इस पहल ने प्रदेश की राजनीति में एक नया रक्तप्रवाह शुरू किया है, जिसके नतीजे भविष्य में और बेहतर दिखेंगे। कैलाशनाथभट्ट, भाजपा प्रवक्ता
{2010 में 30 साल से कम उम्र के पंचायत समिति सदस्य सिर्फ 22% थे। अब 30%
{पिछले चुनाव में 50 से ज्यादा उम्र के पंस. सदस्य 12% थे। अब 7%।
आरक्षित वर्ग में भी बदली सूरत
उम्रके मामले में एससी, एसटी और ओबीसी तथा महिलाओं में यह शिफ्टिंग शिक्षा के कारण हुई है। अब तक एससी, एसटी, ओबीसी और महिलाओं में सबसे ज्यादा जनप्रतिनिधि 40 से 50 साल के ही चुने जाते रहे हैं, लेकिन यह पहला मौका है जब शिक्षा की अनिवार्यता ने इन वर्गों के युवाओं को सत्ता सौंप दी है।
{जैसलमेर में 60 से अधिक उम्र का एक ही प्रत्याशी जिला परिषद सदस्य बना है। 50% से ज्यादा 25 से कम उम्र के।
{बाड़मेर में 45% जनप्रतिनिधि 25 साल से कम उम्र के हैं।
{बारां में 65% से ज्यादा सीटों पर 35 साल से कम उम्र के युवा चुनकर आए हैं। जालौर में 50% सदस्य 35 से कम उम्र के हैं।
{अजमेर में 35 साल तक के 24 जिला परिषद सदस्य बने हैं। इनमें 12 तो 25 साल से भी कम उम्र के हैं।
{जयपुर में जिला परिषद के 21 से 35 साल के युवा जनप्रतिनिधि 30 हैं। 12 युवा ऐसे हैं, जो 25 साल से भी कम उम्र के हैं।
आदिवासी जिलों में बदले हालात
पिछलेचुनाव में आदिवासी जिलों में चुनाव जीतने वाले ज्यादातर प्रधान और जिला प्रमुख 40 वर्ष से अधिक उम्र के थे लेकिन इस बार आठ आदिवासी जनसंख्या बहुल जिलों में 68 में से 28 प्रधान 30 वर्ष से कम आयु के हैं। इन जिलों में 30 से 50 वर्ष तक की उम्र वाले प्रधानों की तादाद 25 है। यानि इन जिलों में 78 प्रतिशत प्रधान 50 वर्ष से छोटी उम्र के हैं।
त्रिभुवन | जयपुर
पंचायतीराज में शिक्षा की अनिवार्यता ने प्रदेश की राजनीति का पूरा चेहरा बदल दिया है। पंचायतीराज में अब 40 से 50 साल की उम्र के लोगों से 21 से 30 साल की उम्र के युवाओं के हाथ पावर शिफ्ट हो गया है। प्रदेश में पहली बार 295 में से 108 प्रधान 30 साल से कम उम्र के हैं। इनमें 60% महिलाएं हैं। प्रदेश में 40 वर्ष तक की उम्र के 200 से ज्यादा प्रधान चुने गए हैं। भास्कर की पड़ताल में यह सामने आया है कि राज्य में सिर्फ 30% प्रधान ही ऐसे हैं जिनकी उम्र 40 साल से ज्यादा है। यानी पंचायत समितियों के 70% मुखिया 40 साल से कम आयु के हैं। पिछली बार करीब 33% प्रधान ऐसे थे जिनकी उम्र 50 साल से ज्यादा थी। युवा हाथों में पंचायत समितियों की बागडोर आना प्रदेश ही नहीं, देश की राजनीति में भी एक बड़ा और अहम बदलाव है। खास बात ये है कि यह बदलाव शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े और आदिवासी जनसंख्या बहुल जिलों में हुआ है। इन जिलों में उच्च शिक्षित युवाओं के हाथों में पंचायत समितियों और जिला परिषदों की कमान गई है। प्रदेश में यह पहला मौका है जब पंचायती राज के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के चेहरों से अशिक्षा का धब्बा दूर हो गया है। प्रदेश में जिला परिषदों के सदस्यों की फेहरिस्त पर नजर डालें तो वहां भी ऐसे उदाहरण मौजूद हैं। जिला परिषदों में भी सबसे ज्यादा पिछड़े जिलों में सबसे ज्यादा युवा निर्वाचित हुए हैं।