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हरि अनन्त, हरि कथा अनन्ता...

7 वर्ष पहले
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अजमेर| कहतेहैं कई बार समय ठहर जाता है, यह मानव मन की अनुभूतियों की ही एक दशा है, वरना समय कब ठहरा है। गुरुवर हरप्रसाद मिश्रा ‘उवैसी’ को भौतिक जगत से विदा हुए आज 6 वर्ष हो गए मगर उनकी प्रत्येक मुद्रा, उनके कहे शब्द, जीवनानुभव, व्याख्याएं, उनकी अावाज, उनका गायन सब कुछ हृदय में ठीक इस तरह स्पंदित होता है जैसे वे हर क्षण आंखों के सम्मुख घटित हो रहा हो।

आध्यात्म और दर्शन के उच्चतम शिखर पर पहुंचकर भी आपके व्यक्तित्व में जो सरलता और अपनत्व था वह प्रत्येक व्यक्ति को मंत्रमुग्ध करता रहा। उन्हें बच्चों से तुतलाती जुबान में बात करने की कला और बड़ो से मन:स्थिति के अनुरूप बात करने का अद्भुत कौशल प्राप्त था। उनकी बातों में प्रवाहित होता अपनत्व एवं माधुर्य मानने को मजबूर करता है गुरुभक्ति क्या होती है, इसका अंदाज बाबा बादामशाह के प्रति आपका समर्पण और विश्वास देखकर लगाया जा सकता था। जितने एकनिष्ठ और सर्व समर्पित आप शिष्य थे, उतना ही गरिमामय शिष्य आपने रामदत्त मिश्रा ‘उवैसी’ के रूप में पाया। किशोरावस्था से ही पिता-पुत्र के संबंध गुरु-शिष्य में परिवर्तित होने लगे। अपने गुरु की सेवा एवं उनके द्वारा कहे गए प्रत्येक शब्द को आदेश की तरह मानते हुए रामदत्त मिश्रा ‘उवैसी’ ने रामकृष्ण परमहंस के विवेकानन्द और गुरु द्रौण के एकलव्य को साकार कर दिखाया। अपने पुत्र को समस्त सांसारिक मोह तजकर एक शिष्य के भाँति लगभग चार दशकों तक शिक्षित-दीक्षित करने वाले गुरुदेव हरप्रसाद मिश्रा के उर्स पर सभी अनुयाइयों की ओर से सादर स्मरण एवं नमन। -गोपाल गर्ग