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सुख हो या दुख, भगवान को कभी भूलें : संत उत्तमराम

4 वर्ष पहले
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अजमेर। हमसदैव सुख की कामना करते हैं, दुख कोई नहीं चाहता। दुख आता है तो सबसे पहले भगवान याद आते हैं, जब दुख के दिन दूर हो जाते हैं तो भगवान को भूल जाते हैं, लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए। ये विचार युवा संत उत्तमराम शास्त्री ने दादी में आयोजित चातुर्मास श्रीमद‌्भागवत कथा के दौरान व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि सुख हो या दुख, भगवान का स्मरण सदैव बना रहना चाहिए। यदि हम सुख में भी भगवान को याद करते रहेंगे तो दुख के दिनों से जल्दी मुक्ति पाई जा सकती है।

महाराज ने श्रद्धालुओं को कुंती भीष्म स्तुति प्रसंग से अवगत कराते हुए महाभारत काल से जुड़े प्रसंगों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि महाभारत का युद्ध खत्म हो गया था। युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर की राजगादी संभाल ली थी। सब कुछ सामान्य हो रहा था। एक दिन भगवान श्रीकृष्ण द्वारिका लौट रहे थे। पांचों भाई और उनका परिवार श्रीकृष्ण को नगर की सीमा तक विदा करने आया। सब की आंखों में आंसू थे। भगवान भी एक-एक कर अपने सभी स्नेहीजनों से मिल रहे थे। सबसे मिलकर उन्हें कुछ ना कुछ उपहार देकर श्रीकृष्ण ने विदा ली। अंत में वे पांडवों की माता और अपनी बुआ कुंती से मिले। भगवान ने कुंती से कहा कि बुआ आपने आज तक अपने लिए मुझसे कुछ नहीं मांगा। आज कुछ मांग लीजिए। मैं आपको कुछ देना चाहता हूं। कुंती की आंखों में आंसू गए। उन्होंने रोते हुए कहा कि हे श्रीकृष्ण अगर कुछ देना ही चाहते हो तो मुझे दु:ख दे दो। मैं बहुत सारा दु:ख चाहती हूं। श्रीकृष्ण आश्चर्य में पड़ गए। श्रीकृष्ण ने पूछा कि ऐसा क्यों बुआ, तुम्हें दु:ख ही क्यों चाहिए। कुंती ने जवाब दिया कि जब जीवन में दु:ख रहता है तो तुम्हारा स्मरण भी रहता है। हर घड़ी तुम याद आते हो। सुख में तो यदा-कदा ही तुम्हारी याद आती है। तुम याद आओगे तो में तुम्हारी पूजा और प्रार्थना भी कर सकूंगी।

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