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कलंक मिटाने के लिए समाज सेविका बनी शिक्षिका

8 वर्ष पहले
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समाजमें कुछ जातियों के नाम अक्सर अपशब्द या नीचा दिखाने के रूप में प्रयोग किए जाते हैं। ये नाम जब कभी भी इस्तेमाल किए जाते हैं जाति विशेष के लोगों के सीने में तीर की तरह चुभते हैं। जैसे - जब कभी भी कोई व्यक्ति बार-बार मांगता रहता है या खाता रहता है तो लोग उसे भूखा बंगाली कह डालते हैं। कभी बंगाल में भुखमरी फैली होगी तभी ये शब्द प्रचलन में आया होगा।

जब कभी भी लोग आपस में झगड़ा करते हैं, शोर-शराबा करते हैं, चिल्लाते हैं तो उसे भी अनुसूचित जनजाति में शामिल एक जाति का संबोधन देते हुए तंज कसे जाते हैं। रामगंज स्थित राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय की प्राध्यापक चेतना उपाध्याय को ये जातिगत शब्द बहुत बुरे लगे। उनके मन में आया कि किसी जाति विशेष को इस तरह गलत संबोधन देकर क्यों चिढ़ाया जाता है। हालांकि वे खुद उस जाति से कोई संबंध नहीं रखती फिर भी बुरा लगा। वे सोचने लगीं कि मुझे इतना बुरा लगता है तो उस जाति विशेष के लोगों को कितना बुरा लगता होगा। बस फिर क्या था। उन्होंने ठान लिया कि वे इस जाति विशेष के कुछ ऐसा करेंगी जिससे लड़ाई-झगड़ा होने पर कोई भी समाज इस संबोधन से उन्हें चिढ़ाएं नहीं। लिहाजा वे जुट गई हैं। चेतना उपाध्याय शिक्षिका के साथ-साथ अब समाज सेविका भी बन गई हैं। वे इस जाति विशेष की कॉलोनी में जाकर बच्चों और महिलाओं को पढ़ा रही हैं। जीवन में किस तरह जिया जाता है। कैसा व्यवहार किया जाता है इसका व्यवहारिक पाठ पढ़ा रही हैं।

बस्ती में रहने वाली आशा और भारती अब पढ़ना चाहती हैं। उन्हें शिक्षा का महत्व समझ में आने लगा है। वे शिक्षित होकर अपने बच्चों को भी शिक्षित करना चाहती हैं। उनका मानना है कि यदि बच्चे पढ़ेंगे-लिखेंगे तो अपना भविष्य स्वयं बना सकेंगे। उपाध्याय पढ़ने आने वाली महिलाओं को निशुल्क डीवीडी का वितरण करती हैं। यह महिलाएं अपने घर पर जाकर जब भी समय मिलता है टेलीविजन के माध्यम से अक्षर ज्ञान सिखाती हैं।

सराहनीय कार्यों को मिली प्रशंसा

उपाध्यायके सराहनीय कार्यों को जिला एवं राज्य स्तर पर सराहा गया। अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टीवल जयपुर में बेस्ट डायरेक्टर का अवार्ड मिला। अखिल भारतीय साहित्य मंडल इलाहाबाद ने राष्ट्र भाषा गौरव की मानद उपाधि से नवाजा है। इसी प्रकार अन्य कार्यों के लिए भी सम्मानित किया गया है।

डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से अक्षर ज्ञान

चेतनाउपाध्याय ने विद्यालय की पूर्व छात्रा योगिता की मदद ली। उन्होंने बस्ती का सर्वे कर तय किया कि यहां पर रहने वाले वाले बच्चे एवं महिलाओं को शिक्षित करेंगे। लेकिन यह काम चुनौती से कम नहीं था। कोई भी किताब और कॉपी से पढ़ने को तैयार नहीं था। उन्होंने हार नहीं मानी और एक डॉक्यूमेंट्री तैयार की। शुरू में यह 20 मिनट की थी। बाद में इसे 50 मिनट कर दिया। इसमें अक्षर ज्ञान, स्वर-व्यंजन और अंक कैसे पहचाने का उल्लेख किया गया। इसे रोचक बनाने के लिए दैनिक जीवन से जुड़े कार्यों की झलकियों के माध्यम से सिखाया जा रहा है।

शिक्षिका चेतना उपाध्याय।

चेतना उपाध्याय की कक्षा में बैठे बच्चे एवं महिलाएं।