पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

गरीब नवाज के दर सदियों से मनाया जा रहा वसंत

5 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
हजरतख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह देश में कौमी एकता और आपसी मोहब्बत के पयाम की अलमबरदार मानी जाती है। मजहबी जुनून से परे इस सूफी मरकज की खासियत ही यही है कि यहां आपसी भाईचारा और गरीबों से मोहब्बत का दर्स सभी लोगों को दिया जाता है।

यही वो पैगाम है, जिसके आकर्षण में मुसलमानों के साथ ही बड़ी संख्या में हिंदू और अन्य मजाहिब के लोग गरीब नवाज की मजार पर अपनी मोहब्बत फूलों के रूप में और चादर के रूप में पेश कर अकीदत का इजहार करने आते हैं।

शाही कव्वाल विरासत में मिली परंपरा

दरगाहके शाही कव्वाल असरार हुसैन अब 74 बरस के हो गए हैं। इन्हें यह परंपरा विरासत में मिली है। हुसैन के मुताबिक वे 13वीं पीढ़ी से हैं और मरहूम वालिद इकराम हुसैन के साथ वे बचपन से ही इस उत्सव में बड़ी अकीदत के साथ शामिल होते रहे हैं।

देश में हजरत निजामुद्दीन औलिया और प्रदेश में ख्वाजा गरीब नवाज

अंजुमनसैयदजादगान के सचिव सैयद वाहिद हुसैन अंगाराशाह के मुताबिक दिल्ली स्थित हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह में सबसे पहले वसंत की शुरुआत हुई। इधर, राजस्थान में हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह से इसकी शुरुआत हुई।

अंगाराशाह के मुताबिक हजरत अमीर खुसरो हजरत निजामुद्दीन औलिया के शागिर्द थे। अमीर खुसरो अरबी, फारसी, उर्दू समेत सात-आठ जवानों के माहिर थे। रिवायतों के मुताबिक एक बार वसंत का उत्सव आया। लड़कियां और महिलाएं खुशरंग पीले वस्त्र पहने फूल सजाकर मंदिरों में चढ़ाने जा रही थीं। हजरत अमीर खुसरो के पीरो मुर्शिद हजरत निजामुद्दीन औलिया गुमसुम और उदास थे। हजरत अमीर खुसरो ने इन लकड़ियों महिलाओं से प्रेरणा ली अौर खुसराे ने वसंती फूलों का गुलदस्ता तैयार किया। खुसरो ने सूफियाना कलाम पेश करते हुए और सूफी रक्स करते हुए यह गुलदस्ता हजरत निजामुद्दीन औलिया को पेश किया। यह अदा हजरत निजामुद्दीन औलिया को बहुत पसंद आई। तब से ही हर साल यह परंपरा वसंत के मौके पर हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह में शुरू हो गई। इधर, कदीमी जमाने से हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह में भी यह परंपरा जारी है।

रबी उल आखिर की 5 तारीख को आयोजन

हिजरीसंवत के माह रबी-उल-आखिर की पांच तारीख को ख्वाजा साहब की दरगाह में वसंत पेश किया जाता है। इस दिन सुबह करीब 11 बजे दरगाह के निजाम गेट से वसंत का जुलूस रवाना होता है। शाही चौकी के कव्वाल सरसों, गेंदा आदि पीले फूलों का गुलदस्ता अपने हाथों में थामे अमीर खुसरो के कलाम, आज बसंत मना ले सुहागिन, नाजो अदा से झूम लो, ख्वाजा की चौखट चूम लो, बसंत फूलों के गढ़वे हाथ ले, गाना बजाना साथ ले, क्या खुशी और ऐश का सामान लाती है बसंत, ख्वाजा मोईनुद्दीन के घर आज आती है बसंत, गाते हुए जुलूस के रूप में बुलंद दरवाजा, सहन चिराग, संदली गेट होते हुए अहाता-ए-नूर तक जाते हैं। वहां गरीब नवाज की मजार पर फूलों का गुलदस्ता पेश किया जाता है। जुलूस में शाही कव्वाल असरार हुसैन और उनके साथियों और खादिमों के अलावा दरगाह दीवान सैयद जैनुअल आबेदीन भी होते हैं। बसंत का गुलदस्ता पेश कर सभी देश में अमन, चैन एवं खुशहाली की दुआ करते हैं।

खबरें और भी हैं...