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मोहम्मद गोरी ने 60 घंटे में बनवाई थी मस्जिद, डर था इसके पीछे का कारण

वर्ल्ड फेमस अजमेर दरगाह के पास बनी यह विरासत बेहद खास है। इसका इतिहास 800 साल पुराना है।

Dainik Bhaskar

Sep 25, 2015, 02:20 AM IST
अढ़ाई-दिन का झोपड़ा अढ़ाई-दिन का झोपड़ा
अजमेर. वर्ल्ड फेमस अजमेर दरगाह के पास बनी यह विरासत बेहद खास है। इसका इतिहास 800 साल पुराना है। इसके साथ कई मान्‍यताएं प्रचलित हैं। ऐसा माना जाता है कि इस मस्जिद को बनने में ढाई दिन का समय लगा था, इसलिए इसे अढाई-दिन का झोपड़ा कहा गया। मान्यता यह भी है कि यहां हर साल लगने वाले ढाई दिन के मेले के कारण इसका नाम अढाई-दिन का झोपड़ा पड़ा।
भयभीत होकर गोरी ने बनवाई मस्जिद
इस खंडहरनुमा इमारत में 7 मेहराब एवं हिंदू-मुस्लिम कारीगरी के 70 खंबे बने हैं तथा छत पर भी शानदार कारीगरी की गई है। यहां पहले बहुत बड़ा संस्कृत विद्यालय था। इसका नाम अढ़ाई दिन का झोपड़ा इसलिए रखा गया है, क्योंकि परिसर को ढाई दिन के भीतर मस्जिद के रूप में बदल दिया गया था।

दरअसल, तराई के दूसरे युद्ध (1192ई.) के बाद मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराकर उसका वध किया। इसके बाद वह विजेता के रूप में अजमेर से ही गया था। वह यहां बने मंदिर से इतना भयभीत हुआ कि उसने उसे तुरंत वहां मस्जिद बनाने की इच्छा प्रकट की। उसने अपने गुलाम सेनापति को सारा काम 60 घंटे में पूरा करने का आदेश दिया ताकि लौटते समय वह नई मस्जिद में नमाज अदा कर सके। इसके बाद क्या था, उसके गुलाम सेनापति ने ढाई दिन में ही यहां मस्जिद तैयार करवा दिया था।

आगे की स्लाइड्स में पढ़ें अढ़ाई-दिन के झोपड़े के बारे में कुछ और बातें
27 सितम्बर को वर्ल्ड टूरिज्म डे मनाया जा रहा है। इस मौके पर dainikbhaskar.com ऐसी जगहों के बारे में बता रहा है जो टूरिज्म के लिहाज से लोकप्रिय हैं। आज की कड़ी में हम एक ऐसे मस्जिद के बारे में बता रहे हैं जिसका निर्माण केवल 60 घंटे में हुआ था।
अढ़ाई-दिन के झोपड़े की ऊपर से ली गई फोटो अढ़ाई-दिन के झोपड़े की ऊपर से ली गई फोटो
मंदिर के भव्य स्तंभों को नहीं छेड़ा गया था मस्जिद बनाते समय
 

यहां बने तीनों मंदिर इतने आकर्षक थे कि उनका ध्वंस करने वालों ने लगभग सभी स्तंभों को बने रहने दिया। ऐसे 70 स्तंभ तीन छतों के नीचे इस प्रकार बने हैं कि तीनों छतें मिलकर एक छत के रूप में दिखाई देती हैं। छतदार भवन के आगे अन्य स्तंभ भी हैं, जो पत्थर के मंडप से दिखाई देते हैं।
अढ़ाई-दिन के झोपड़े में बने 70 स्तंभों का समूह। अढ़ाई-दिन के झोपड़े में बने 70 स्तंभों का समूह।
900 साल पुरानी हैं मूर्तियां
 
स्तंभों की ऊंचाई लगभग 25 फीट है और उनमें लगभग 20 फीट की ऊंचाई तक अति सुंदर नक्काशी का काम है। जिसमें अत्यंत सुंदर नमूने बने हुए हैं जिनके ऊपर कई प्रकार की आकृतियां भी हैं। यह एक अस्वाभाविक बात है कि उनमें कोई भी ऐसी आकृति नहीं है जिसका सिर न काटा गया हो। बलुआ पत्थर की मूर्तियां लगभग 900 सालों से सुरक्षित हैं, लेकिन सभी मूर्तियों के चेहरे व्यवस्थित रूप से तोड़ दिए गए हैं। मंदिर परिसर के अहाते में भी विशाल भंडारगृह है, जिसमें और भी अनेक सुंदर मूर्तियां हैं। अपेक्षाकृत कम महत्व के अवशेष अहाते में इस प्रकार पड़े हैं कि जो चाहे उन्हें ले जाए।
अढ़ाई-दिन के झोपड़े की पुरानी फोटो। अढ़ाई-दिन के झोपड़े की पुरानी फोटो।
सुंदर नक्काशी देखते ही बनती है
 

ढाई दिन के झोपड़े में सुंदर नक्काशीदार दरवाजा लगाया गया। इसका श्रेष्ठ वर्णन फ्यूहरर द्वारा पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की 1893 की सालाना रिपोर्ट में इन शब्दों में किया गया है-"समूचे बहिमार्ग में इतनी महीन और कोमल नक्काशी की जाली तराशी गई है कि उसकी तुलना महीन जालीदार कपड़े से की जा सकती है।" कनिंघम ने झोपड़े के बाहरी भाग का वर्णन और भी विशिष्ट तरीके से किया है, "अलंकार के इतने ज्यादा भड़कीलेपन, नक्काशी की इतनी सुंदर प्रचुरता, सजावट का इतना नुकीलापन, शानदार कारीगरी, सजावट की विविधता जिसे हिन्दू कारीगरों ने बनाया था, इन सभी की दृष्टि से इस भवन की तुलना विश्व के सुंदरतम भवन से की जा सकती है।"
अढ़ाई-दिन का झोपड़ा अढ़ाई-दिन का झोपड़ा
अंदरूनी हिस्‍से में दिखती है मंदिर की झलक
 
इस परिसर को नायाब स्थल बनाने में सबसे ज्यादा योगदान काम अबु बक्र का है जिसने इसका नक्शा तैयार किया था। इस परिसर का आधे से ज्यादा हिस्सा मंदिर का होने के कारण मस्जिद का अंदरूनी हिस्‍सा किसी मस्जिद की तुलना में मंदिर की तरह दिखाई पड़ता है। खास बात यह है कि यहां के स्तंभों पर अंकित हजारों कलाकृतियों के सर, आंख और नाक टूटे हुए है।
अढ़ाई-दिन के झोपड़े में बने स्तंभ अढ़ाई-दिन के झोपड़े में बने स्तंभ
इस मस्जिद की खास  है डिजाइन 
 
यह मस्जिद एक दीवार से घिरी हुई है जिसमें 7 मेहराबें हैं, जिन पर कुरान की आयतें लिखी गई हैं। हेरात के अबू बक्र द्वारा डिजाइन की गई यह मस्जिद मुस्लिम वास्तुकला का एक उदाहरण है। बाद में, 1230 ई. में सुल्तान अल्तुतमिश द्वारा एक उठी हुई मेहराब के नीचे जाली जोड़ दी गई थी। 
 
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अढ़ाई-दिन के झोपड़े की पुरानी फोटो। अढ़ाई-दिन के झोपड़े की पुरानी फोटो।
अढ़ाई-दिन के झोपड़े में नमाज अदा करते हुए। अढ़ाई-दिन के झोपड़े में नमाज अदा करते हुए।
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अढ़ाई-दिन का झोपड़ाअढ़ाई-दिन का झोपड़ा
अढ़ाई-दिन के झोपड़े की ऊपर से ली गई फोटोअढ़ाई-दिन के झोपड़े की ऊपर से ली गई फोटो
अढ़ाई-दिन के झोपड़े में बने 70 स्तंभों का समूह।अढ़ाई-दिन के झोपड़े में बने 70 स्तंभों का समूह।
अढ़ाई-दिन के झोपड़े की पुरानी फोटो।अढ़ाई-दिन के झोपड़े की पुरानी फोटो।
अढ़ाई-दिन का झोपड़ाअढ़ाई-दिन का झोपड़ा
अढ़ाई-दिन के झोपड़े में बने स्तंभअढ़ाई-दिन के झोपड़े में बने स्तंभ
अढ़ाई-दिन के झोपड़े की पुरानी फोटो।अढ़ाई-दिन के झोपड़े की पुरानी फोटो।
अढ़ाई-दिन के झोपड़े में नमाज अदा करते हुए।अढ़ाई-दिन के झोपड़े में नमाज अदा करते हुए।
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