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धोखे का बैंक, बेबसी की बही और नाउम्मीदी के आंसू. खुद की पूंजी के लिए परेशान

7 वर्ष पहले
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अजमेर। दी अजमेर अरबन को-ऑपरेटिव बैंक प्रकरण में खाताधारकों को जल्दी ही कोई राहत मिलने की कोई उम्मीद नहीं है। सरकारी प्रक्रिया इतनी लंबी है कि यदि उन्हें अपनी ही जमा पूंजी का कुछ हिस्सा भी अगर मिलना तय होता है तो वह प्राप्त करने के लिए भी लंबा इंतजार करना होगा।
आरबीआई से बैंक का लाइसेंस रद्द होने के बाद भी सहकारिता विभाग एक माह के भीतर तो सिर्फ लिक्विडेटर ही नियुक्त करेगा। इधर शनिवार को निराश खाताधारक अपने-अपने एफडीआर लेकर बैंक पहुंचे, लेकिन वहां संतोषजनक जवाब देने वाला कोई जिम्मेदार अधिकारी मौजूद नहीं था। मंगलवार को पीड़ित खाताधारक सहकार भवन का घेराव करेंगे। वहीं दूसरी ओर बैंक के लॉकर्स भी खाली होना शुरू हो गए हैं।

लाइसेंस रद्द होने की जानकारी मिलते ही सुबह से ही पीड़ित खाताधारकों का बैंक पहुंचना शुरू हो गया। हैरत की बात यह रही कि इतना बड़ा घटनाक्रम होने के बावजूद बैंक अथवा सहकारी विभाग का कोई जिम्मेदार अधिकारी वहां पर मौजूद नहीं था।
बैंक में काम करने वाले क्लर्क स्तर के कर्मचारी ही मौजूद थे। पीड़ितों के पूछने पर कि हमारी जमा पूंजी कब तक मिल सकती है तो उक्त कर्मचारी यह कहता नजर आया कि हम क्या कर सकते हैं। आप चाहे जहां पर जा सकते हो। इस जवाब से पीड़ितों का गुस्सा और फूट पड़ा और उन्होंने वहां मौजूद स्टाफ को खरी-खरी सुनाई।
मची खलबली, लॉकर्स हुए खाली
बैंक का लाइसेंस रद्द होने के बाद लॉकर्स ऑपरेट करने वालों में खलबली मच गई। जिन लोगों बैंक से लॉकर्स की सुविधा ले रखी थी बैंक पहुंचने लगे। बैंक कर्मचारियों ने पहले लॉकर ऑपरेट करने से ही इनकार कर दिया। कई लोग निराश ही लौट गए। लेकिन प्रहलाद चंदेला इस बात पर अड़ गए कि आखिर किसके आदेश पर रोक लगाई है। बैंक में मौजूद कर्मचारी कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका।
चंदेला ने जब महाप्रबंधक हरीश सिवासिया से फोन पर बात की तो उन्होंने भी आरबीआई का हवाला देते हुए सोमवार तक इंतजार करने को कहा। प्रबंध संचालक उत्तम चंद तोषावड़ा भी कोई जवाब नहीं दे पाए। बैंक के प्रशासक राजीव लोचन शर्मा की अनुमति के बाद ही लॉकर्स ऑपरेट हो सके। कुछ ही देर में करीब कई लोगों ने लॉकर में रखी नकदी व जेवरात निकालने शुरू कर दिए।
ये होगी बैंक की अगली प्रक्रिया

बैंक प्रशासक राजीव लोचन शर्मा ने बताया कि लिक्विडेटर की नियुक्ति एक माह में की जाएगी। डिपोजिट इंश्योरेंस का क्लेम देने के लिए प्रक्रिया को शुरू करेंगे। दो माह के भीतर विज्ञापन जारी कर क्लेम के दावे लेंगे। लिक्विडेटर इस दौरान जमा पूंजियों, देनदारी व लेनदारी का आकलन करेंगे। जो राशि बैंक के पास है उसमें अनुपात के आधार पर खाताधारकों को दिए जा सकेंगे। इसमें कम से कम 6 माह लग सकते हैं।
आगे की स्लाइडों में है बैंक पहुंचकर निराश होने वालों की बेबसी के बारे में विस्तार से-