अलवर. मायरारी बेला आई, चुनरी बाई ने ओढ़ाई। झांझ मंजीरा बाजे मन में हरियाली छाई..... भजन के दौरान बैंड बाजे के साथ नरसी ठाकुरजी रुक्मणी और अपने साथियों के साथ नानी बाई के यहां मायरो (भात) भरने पहुंचे। नानी बाई की प्रतीक कथा बाल व्यास जया किशोरी को चुनरी ओढ़ाने की रस्म शुरू होते ही श्रद्धालु खुशी में नृत्य करने लगे।
यह नजारा था मंगल परिणय मैरिज होम में आयोजित नानी बाई रो मायरो कथा के अंतिम दिन के कार्यक्रम का। मायरे में फल, मिठाई, मेवा, आभूषण, चांदी के बर्तन दिए गए। कथा वाचक जया किशोरी ने भजनों कृष्ण के जयकारों के साथ मायरे की कथा की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि अपने साथियों के साथ मायरा भरने पहुंचे नरसी से नानी बाई ने पूछा कि भात में क्या क्या लाए हो? नरसी ने जवाब दिया चिंता मत कर सावरिया आएगा ना। बाद में नरसी के नानीबाई के ससुराल पहुंचने पर उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं हुआ। दुखी नरसी ने भगवान से मदद की पुकार की।
इस पर सावरिया वेश बदलकर मायरा के लिए सामान खरीदने जाते हैं। इस दौरान मनहारी का वेश बनाया श्याम चूड़ी बेचने आया। छलिया का वेश बनाया श्याम चूड़ी बेचने आया भजन पर कलाकारों ने नृत्य नाटिका की प्रस्तुति दी। मायरा का सामान खरीदने के बाद रुक्मणी के साथ बेल गाड़ी से जूनागढ़ के रास्ते नानी बाई के यहां मायरा भरने जाते हैं। सवारियां के देरी से आने के कारण नरसी नाराज हुए, लेकिन भगवान के मनाने पर मान गए। भगवान कृष्ण, रुक्मणी और साथियों के साथ नरसी ने नानी बाई का मायरा भरा। जया किशोरी ने बताया कि इस प्रकार भगवान कभी अपने भक्त का विश्वास नहीं तोड़ते हैं।
कथा के यजमान अग्रवाल महासभा के पूर्व अध्यक्ष रमेश मित्तल थे। कथा वाचक ने मुख्य अतिथि एसडीएम डॉ. राजेश गाेयल, महासभा के पदाधिकारियों जयंती संयोजक का सम्मान किया। कथा के समापन पर श्रद्धालुओं को बधाई के रूप में सुहाग सामग्री राखी दी गई। इससे पहले सुबह अग्रवाल धर्मशाला से कथा स्थल तक शोभायात्रा निकाली गई। रथ में कथा वाचक जय किशोरी सवार थीं।कथा वाचक जया किशोरी को व्यास पीठ तक डांडिया नृत्य के साथ लाया गया। युवतियां और महिलाएं डांडिया नृत्य करती चल रही थीं।