अलवर। शहर से करीब 65 किलोमीटर दूर इस्माइलपुर गांव। किसी से पूछेंगे तो शायद आपको पहली बार में कोई गांव की खासियत बता पाए, लेकिन देश के कई शहरों में यहां की कारीगिरी को पहचान मिलने लगी है।
दिल्ली का प्रगति मैदान हो या कलकत्ता, बैंगलुरू, लुधियाना, जालंधर, उदयपुर, जयपुर आदि शहरों में लगने वाली कोई एग्जीबिशन, गांव का कोई नुमाइंदा आपको जरूर मिल जाएगा। पहचान का जरिया बन रही हैं गांव के करीब साढ़े तीन सौ कारीगरों द्वारा तैयार की जाने वाली जूतियां।
जूती निर्माण के इस कारोबार की सुखद बात ये है कि 350 कारीगरों में आधी महिलाएं हैं। कारोबार से गांव में ही खुशहाली आने लगी तो परंपराओं की बंदिशें तोड़कर जाटव समाज के अलावा दूसरे समाजों की महिलाओं ने भी इसे रोजगार का जरिया मान लिया।
कुछ साल पहले तक देशी जूतियां बनाने वाले इन कारीगरों ने बिना किसी विशेष ट्रेनिंग के जूतियों के नए-नए डिजायन बनाने शुरू कर दिए। अपनी समझ से तैयार किए गए इन डिजाइनों पर बनी जूतियों की डिमांड इस कदर बढ़ी की अब यहां से हर साल साढ़े तीन लाख जूतियां बनाकर अलग-अलग शहरों में भेजी जाने लगी है। इस कारोबार से जुड़े परिवारों की लाइफ स्टाइल भी बदलने लगी है।
कल तक जमींदारों के यहां मजदूरी कर पेट पालने वाले परिवार अब घर बैठकर अपने धंधे को आगे बढ़ाने में जुटे हैं। संभवतया आगे बढ़ने की यह ललक ही है कि गलियों में पंचायत चुनावों का शोर इनके काम को प्रभावित नहीं कर रहा।
कशीदाकारी से मिल रहा रोजगार
महिलाओं का मुख्य काम जूतियों पर कशीदा कारी करना है। इससे अब जाटव के अलावा दूसरे समाज की महिलाएं भी जुड़ने लगी हैं। महिला शीला सिंधी, हीरा देवी, मंजू आदि का कहना था कि जब घर में ही रोजगार मिल रहा है तो परिवार की आर्थिक स्थिति को बेहतर करने में क्या हर्ज है।
इनके अनुसार शुरुआत में परिवार के अलावा आस-पड़ौस के लोगों ने कटाक्ष भी किए लेकिन काम बढ़ते देख अब सब समाज से महिलाएं इस कारोबार से जुड़ने लगी हैं। गांव की कुछ महिलाएं जूतियों के अलावा लैदर गुड्स से जुड़े अन्य उत्पाद भी बना रही हैं, इसमें प्रमुख तौर महिलाओं के पर्स और लैदर बेल्ट भी हैं।