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धाराओं के आधार पर गिरफ्तारी को गलत माना, कार्रवाई के निर्देश

7 वर्ष पहले
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अलवर | छेड़छाड़ के एक मामले में पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारी को एडीजे संख्या 2 योगेश कुमार गुप्ता की अदालत ने गलत ठहराया है और पुलिस की इस कार्रवाई को अवैध हिरासत का मामला माना है। अदालत का कहना है कि बिना जांच आवश्यक कारण बताए गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। अदालत ने इस मामले के आरोपी को जमानत पर रिहा करने के आदेश देते हुए दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ उच्चतम न्यायालय की गाइड लाइन की अवहेलना में कार्रवाई के निर्देश भी दिए हैं।

इस मामले में अदालत ने पुलिस को बेवजह शक्ति का उपयोग का दोषी माना है। आदेश में अदालत ने यह भी कहा है कि पुलिस संज्ञेय गैर जमानती अपराध में अपनी गिरफ्तारी की विधि प्रदत्त शक्ति का दुरुपयोग कर संदिग्ध अपराधियों के साथ अमानवीय व्यवहार करने के लिए बदनाम रही है। प्रभावशाली लोग पुलिस के सहयोग से आमजन की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संविधान प्रदत्त मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन करवाते हैं।
पुलिस गिरफ्तारी को एक हथियार के रूप में काम में लेती चली रही है, जिसके कई दुष्परिणाम देखने में सामने रहे हैं और आमजन को समाज में नीचा देखने के साथ साथ हमेशा -हमेशा के लिए उस पर लगे धब्बे का दंश का झेलना पड़ता है। पुलिस अपनी कार्यशैली में कोई सुधार लाना नहीं चाह रही है। ही पुलिस आमजन के साथ मित्रवत व्यवहार कर रही है। इसीलिए पुलिस द्वारा बिना वारंट गिरफ्तारी की शक्तियों को नियंत्रित एवं संतुलित करने का प्रावधान किया गया है। इसकी पालना जरूरी है।
यह है मामला : एक विवाहिता ने 17 अप्रैल 2013 को महिला थाने में गालिब सैयद, मीणा पाड़ी निवासी राकेश जैन, साबू, ईमरत, सूबेदार, ललित अन्य के विरुद्ध उसके साथ छेड़छाड़ मारपीट करने का मामला दर्ज कराया था। इस पर महिला थाना पुलिस ने 12 सितंबर 2014 को राकेश जैन को गिरफ्तार कर लिया। इस पर राकेश की ओर से जिला एवं सेशन न्यायालय के समक्ष जमानत अर्जी पेश की गई। यह अर्जी सुनवाई के लिए अपर सेशन न्यायाधीश संख्या 2 योगेश कुमार गुप्ता को प्राप्त हुई।
इसलिए गलत मानी गिरफ्तारी
- छेड़छाड़ के मामले में पुलिस ने निना जांच की थी गिरफ्तारी
- कोर्ट ने कहा-कारण तलाशे जाएं, उसके आधार पर हो गिरफ्तारी
पुलिस के खिलाफ जज की टिप्पणी : प्रभावशाली लोग पुलिस के सहयोग से आमजन की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संविधान प्रदत्त मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन करवाते हैं। पुलिस गिरफ्तारी को एक हथियार के रूप में काम में लेती चली रही है, जिसके कई दुष्परिणाम सामने रहे हैं और आमजन को समाज में नीचा देखने के साथ साथ हमेशा-हमेशा के लिए उस पर लगे धब्बे का दंश झेलना पड़ता है। -योगेश गुप्ता, एडीजेनं. 2
पुलिस के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश: अदालत ने यह मामला उच्चतम न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना का माना है और इस मामले में संबंधित मजिस्ट्रेट को दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ राजस्थान हाई कोर्ट में अवहेलना की कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। साथ ही अदालत ने आदेश की एक प्रति पुलिस महानिदेशक को भेजकर दोषी अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के लिए भी कहा है।
क्या है उच्चतम न्यायालय की गाइडलाइन: वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक कुमार शर्मा के अनुसार दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 41 में संशोधन के बाद प्रावधान किया गया है कि यदि 7 वर्ष से कम अवधि या 7 वर्ष तक की अवधि के कारावास से दंडनीय संज्ञेय अपराधों में गिरफ्तारी आवश्यक हो तो जांच अधिकारी को धारा 41 (1)(बी)(11) में वर्णित शर्तों की पालना करनी होगी। इसके बाद कारण उल्लेखित करने के बाद गिरफ्तारी की जा सकती है। उच्चतम न्यायालय ने हाल की अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य के मामले में दिए निर्णय में धारा 41(1)(बी) की कठोरता से पालना कराने के लिए समस्त राज्यों के मुख्य सचिवों पुलिस महानिदेशकों को दिशा निर्देश प्रदान किए हैं।
अदालत ने इस मामले में महिला थाना पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारी को उच्चतम न्यायालय द्वारा गिरफ्तारी के संबंध में जारी दिशा निर्देशों की अवहेलना माना। साथ ही राकेश की गिरफ्तारी नहीं, उसे अवैध रूप से हिरासत में लेना माना। अदालत कहना था कि उच्चतम न्यायालय की गाइडलाइन के अनुसार सात वर्ष तक की अवधि के कारावास से दंडनीय अपराध में गिरफ्तारी से पहले उसकी जांच होना जरूरी है। कारण तलाशे जाएं और फिर कारणों के आधार पर गिरफ्तारी की जाए। संज्ञेय या गैर जमानती अपराध होना ही गिरफ्तारी के लिए पर्याप्त नहीं है। राकेश की गिरफ्तारी से पूर्व कारण नहीं जुटाए गए। इसलिए यह गलत है। अदालत ने राकेश जैन की जमानत प्रार्थना पत्र स्वीकार कर उसे 5-5 हजार के जमानत मुचलके पेश रिहा करने के आदेश भी प्रदान किए हैं।
सीजेएम को आदेश की पालना के दिए निर्देश : अदालत ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को निर्देश देते हुए कहा है कि वे अलवर न्याय क्षेत्र में पदस्थापित न्यायिक मजिस्ट्रेटों को गिरफ्तारी के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी आदेशों की पालना सुनिश्चित कराने के लिए निर्देशित करें।