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जरूरत नहीं, जज्बात की जुबां है हमारी हिंदी
मेहताब चौधरी
करुण आमेरिया
खुद पढ़ाने वालों में ही हीनभावना, रुचि के लिए पढ़ने वालों की कमी
कलामहाविद्यालय व्याख्याता अंशु वाजपेयी के अनुसार हिंदी भाषा की हालत दिन दिन चिंताजनक हो रही है। जो इस विषय को पढ़ा रहे हैं वही खुद की श्रेष्ठता के लिए बोलचाल में दूसरी भाषा का प्रयोग करते हैं, यही उनकी हीनभावना का परिचायक है। वाजपेयी के अनुसार वे अक्सर विद्यार्थियों से पूछती हैं कि उन्होंने हिंदी साहित्य क्यों लिया तो अफसोस- रुचि की बात कोई नहीं कहता। रा. नवीन सीसै.स्कूल व्याख्याता मेहताब सिंह चौधरी कहते हैं- हिंदी को समझने पर किसी का जोर नहीं है, अब यह बोलचाल में भी दूसरे दर्जे पर पहुंच रही है, ऐसे में गहन अध्ययन कराकर खोया वैभव लौटाने की दरकार है।
काश सारे कोर्स हिंदी में होते
कंप्यूटरपढ़ना हो या पढ़ाना, अंग्रेजी ज्ञान बेहद जरूरी है। संस्कृत शिक्षिका अर्चना यादव कहती हैं- काश, सबकुछ हिंदी में होता तो बच्चे इस कदर नहीं पिछड़ते। हालांकि यादव हिंदी में रहे नए सॉफ्टवेयर्स को भाषा की दशा-दिशा के लिए अच्छा मान रही हैं।
भावनाओं का जरिया तो बस केवल हिंदी
इंटीरियरडिजाइनिंग छात्रा राधिका खंडेलवाल और फैशन डिजाइनिंग छात्र करुण आमेरिया के लिए भावनाओं को व्यक्त करने का जरिया केवल हिंदी ही है। वे कहते हैं- जो बात हम हिंदी में कहकर समझा सकते हैं वो बात किसी और भाषा में नहीं है। इनके अनुसार हिंदी जब बोलते हैं तो चेहरे के भाव और बोल एकसाथ व्यक्त होते हैं, दूसरी भाषाओं से लगता है कि आवाज डब हो रही है। हालांकि दोनों ही इन दिनों कोर्स की मांग और रोजगार की जरूरत के हिसाब से अंग्रेजी को जरूरी मानते हुए सीखने का प्रयास कर रहे हैं।
पेरिस में परिचित ने पूछा-चाय पीओगे, लगा घर में ही हूं
स्कीमपांच निवासी सॉफ्टवेयर इंजीनियर मिनाली खंडेलवाल ने बताया कि काम के सिलसिले में पेरिस रहना पड़ता हैं। फ्रेंच की आधी-अधूरी जानकारी और अंग्रेजी पर कमांड से वहां कोई परेशानी नहीं होती। ऑफिस हो या कहीं और, हिंदी से जैसे नाता टूट गया। पेरिस में कई दिन रहने के बाद एक दिन किसी परिचित भारतीय के घर जाना हुआ। वहां जैसे ही हिंदी में पूछा गया कि चाय या कॉफी पीओगे, तो लगा कि अपने वतन, अपने घर लौट आई। मिनाली कहती है- देश से बाहर हिंदी जैसे आपकी पहचान, आपका गौरव है।
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