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मोदी और भाजपा के लिए कुछ नसीहतें

6 वर्ष पहले
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मैं पहले ही आगाह कर देना चाहता हूं कि यह लेख बहुत लुभावना नहीं होगा। दिल्ली में पराजय के बाद कई लेखों में विश्लेषण किया गया है कि भाजपा से गलती कहां हुई। अब जब इसे अच्छी तरह समझ लिया गया है तो गौर करना होगा कि इस गड़बड़ी से कैसे उबरा जाए।

यदि भाजपा देश में प्रभावी राजनीतिक पार्टी बनी रहना चाहती है तो 17 ऐसे कार्रवाई योग्य बिंदु हैं, जिन्हें ध्यान में रखकर वह मौजूदा स्थिति से उबर सकती है। बहुत कुछ दांव पर लगा है। यह मामला मोदी या भारतीय जनता पार्टी का उतना नहीं है। यह तो भारत का मामला है। बरसों बाद शीर्ष पर स्थिरता देने वाला जनादेश मिला है। यदि भाजपा यह मौका गंवा देती है तो वह देश को एक दशक पीछे धकेल देगी। तो हम उन बिंदुओं की चर्चा शुरू करते हैं :

सबसे पहले तो भाजपा यह समझ ले कि दिल्ली में चुनावी हार पूरी तरह से विनाश ही है। इसे हल्का करके देखने की जरूरत नहीं है। इसने मोदी का आभामंडल नष्ट कर दिया है या कहिए कि मोदी लहर खत्म कर दी है, जिसके कारण मतदाता बिना सोचे-समझे मशीन की तरह भाजपा को वोट दे रहा था। इससे यह भी पता चलता है कि शीर्ष नेतृत्व को सड़कों पर मौजूद लोगों या पार्टी कार्यकर्ताओं की भावनाओं का कुछ पता नहीं था। मोदी के चुनाव पूर्व के वादों, काम को नशे की तरह लेने के उनके स्वभाव और सरकारी अधिकारियों के साथ कथित कड़ाई के बावजूद योजनाओं पर अमल कराने की उनकी योग्यता पर संदेह पैदा हो गया है।

दूसरी बात, प्रधानमंत्री के प्रति पूरे सम्मान के बावजूद कहना पड़ेगा कि वे जरा ज्यादा ही ऊंचा उड़ रहे हैं। उन्हें धरती पर आना होगा। आप वैश्विक राजनीतिज्ञ की छवि पेश करने का प्रयास करें। आपने कांग्रेस के कमजोर रहते भाजपा के वोट कुछ प्रतिशत बिंदुओं से बढ़ाकर सत्ता विरोधी चुनाव जीता है। अभी आपने भारत का रूपांतरण नहीं किया है। विश्व नेताओं के साथ पींगे बढ़ाने की जरूरत नहीं है। इसकी बजाय झुग्गी बस्तियों में जाइए। हर माह एक अलग झुग्गी बस्ती में जाइए। हां, आप जा सकते हैं फिर चाहे आपका पद कितना ही बड़ा क्यों हो। फीजी जाने की जरूरत नहीं है (माफ करना फीजी, हमारे यहां कुछ अहम मसले हैं।)। फिर अनिवासी भारतीयों से सिर्फ तालियां बटोरने का कोई अर्थ नहीं है। यदि वे आपको इतना ही चाहते हैं तो उन्हें जेबें ढीली करने को कहिए। यदि एक लाख अनिवासी भारतीय हर साल एक हजार डॉलर देने का वादा करें तो सालाना 10 करोड़ डॉलर साफ-सुथरा धन आपके पास होगा। इससे भाजपा की फंडिंग की सफाई कीजिए। वैसे, यह काम आप कब करने वाले हैं?

लोकपाल को वजूद में लाएं। सीबीआई और केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) को अच्छा और स्वतंत्र बनाइए। व्यवस्थित रूप से भ्रष्टाचार की सफाई कीजिए। यदि कल मोदी वहां नहीं होंगे, तो क्या होगा? मीडिया को या पार्टी के जूनियर साथियों को धमकाइए मत। ऐसा कुछ करें कि उनमें आपके प्रति डर नहीं, सम्मान पैदा हो। आत्म-संतुष्ट होने की जरूरत नहीं है। पार्टी में प्रतिभाओं को यह सोचकर खत्म करें कि एक दिन वे आपके लिए खतरा बन जाएं। यह भाजपा है। एक आदमी की पार्टी होना इसके डीएनए में नहीं है।

प्रतिगामी हिंदू धर्मांधों पर लगाम लगाएं। वे बकवास करते रहते हैं। आप सुनते रहते हैं। आपको उन्हें साफ-साफ कहना होगा कि यह सब ठीक नहीं है। युवा पीढ़ी को ऐसे किसी नेता को समर्थन देना नहीं सुहाता, जिसका विश्वास स्वतंत्रता समानता पर आधारित समाज में नहीं है। अपने कुछ पुरातनपंथी साथियों में लैंगिक मुद्‌दों और अल्पसंख्यक अधिकारों की समझ पैदा करने के लिए उन्हें विदेश भेजें।

अपने भाषणों को लेकर जरूरत से ज्यादा आत्म-विश्वास ठीक नहीं है। अपने आस-पास सिर्फ उन्हें ही रखें, जो आपकी विरुदावली गाएं। आलोचकों को भी रखें। सार्वजनिक रूप से आप जो भी बोलने वाले हों, उसे पहले परखा जाना चाहिए। यदि आप ऐसा करते तो ‘नक्सल’ ‘बाजारू’ जैसे कमेंट हटा दिए जाते। प्रधानमंत्री कभी उत्तेजना फैलाने वाला नेता नहीं हो सकता। फिर, पहनावा सादगीपूर्ण हो। ईमानदारी, कार्यक्षमता और करुणा से करिश्माई व्यक्तित्व पैदा होता है, महंगे कपड़ों से नहीं। युवाओं से जुड़े रहें और उनके लिए ऐसा कुछ करें, जो नजर आए। उन्होंने लोकसभा चुनाव में आपके लिए नारे लगाए। उन्होंने आपकी तारीफ में फेसबुक और ट्विटर भर दिए। आपने उनके लिए क्या किया? चुनाव के पहले आप भाषण देने एसआरसीसी गए थे। क्या उसके बाद आप किसी कॉलेज में गए हैं?

पार्टी अध्यक्ष वाकई चतुर होंगे परंतु कभी-कभी मामला चतुराई का नहीं, इस बात का होता है कि जनता की परवाह किसे ज्यादा है। हमेशा ही शतरंज की चालों से चुनाव नहीं जीते जाते, पर जनता से जुड़कर यह संभव है। पार्टी अध्यक्ष की जैसी छवि है (हो सकता है यह उनके वास्तविक व्यक्तित्व से अलग हो), वह आत्म-विश्वास नहीं जगाती। आपका उनके साथ खड़े रहना वैसा ही जैसा अमिताभ बच्चन का अमर सिंह के साथ खड़े होना। क्या इससे अमिताभ को कोई मदद मिली?

लोगों पर हावी मत होइए, उनसे बातचीत कीजिए। यदि आप सवालों के जवाब नहीं देना चाहते तो लोगों को संबोधित मत कीजिए। रेडियो पर मोनोलॉग (एकालाप) मत दीजिए। इससे लोगों को इंदिरा गांधी और उत्तर कोरिया याद आते हैं। यह ठीक नहीं है। और अधिक कॉलेज खोलिए। पर्यटन को खुला कीजिए। अधिक रोजगार देने वाले क्षेत्रों को करों में राहत दीजिए। छोटे शहरों में मुख्यालय ले जाने वाली कंपनियों को कर-अवकाश दीजिए। वह सब कीजिए जो भीतरी इलाकों में रोजगार और कौशल को ले जाने के लिए आवश्यक है। प्राथमिक स्कूलों की दशा सुधारिए। स्कूल जाने वाले हमारे आधे बच्चे ठीक से पढ़ नहीं पाते।

शहरों को सस्ते आवास वाले विस्तार चाहिए। जहां स्वच्छ जल, बिजली और परिवहन का व्यवस्थित ढांचा हो। यही एक रास्ता है, जिसके जरिये शहरी लोग गरिमापूर्ण जीवन जी सकते हैं। उन्हें गरिमा दीजिए। उन्होंने दिल्ली में आपको वोट नहीं दिया, याद है? उनका दिल फिर जीतिए। वास्तविक धरातल पर आइए। काम जीवन में संतुलन कायम कीजिए। कभी-कभार प्रधानमंत्री कोई फिल्म क्यों नहीं देख सकता? एक महिमामंडित प्रधानमंत्री की बजाय मानवीय प्रधानमंत्री ज्यादा अच्छी तरह काम कर सकता है।

प्रतिमाओं की जरूरत नहीं है। स्कूल या प्रतिमा, अस्पताल या मूर्ति? अब इस पर और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। विरोधियों पर व्यक्तिगत हमले बिल्कुल नहीं होने चाहिए फिर कितना ही प्रभावशाली व्यंग्य या विनोद क्यों हो। अालोचनात्मक सलाहकारों से पिंड छुड़ाएं। धनी उद्योगपतियों के साथ घूमना-फिरना बंद हो। हो सकता है आधिकारिक रूप से यह जरूरी हो, लेकिन इसे मीडिया इवेंट बनाने से बचें। अरबपतियों से नहीं, एक अरब लोगों से मुखातिब होना बेहतर होगा। आखिरकार, ऊपर बताई सारी बातों का निचोड़ यही है कि भाजपा लोगों की सुने। उनकी इच्छा के मुताबिक काम करें, क्योंकि इसी के लिए तो वह है- जनता के द्वारा, जनता के लिए। chetan.bhagat@gmail.com

चेतन भगत

अंग्रेजी के युवा उपन्यासकार