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अस्तित्व खोता बर्ड़ोद का एेतिहासिक विश्रामगृह

7 वर्ष पहले
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महाराजा जयसिंह द्वारा बर्ड़ोद की रूंध जंगल में निर्मित विश्राम गृह अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। देखभाल मरम्मत के अभाव में विश्राम गृह की सुंदरता और भवन का ढांचा जगह-जगह से जीर्ण-क्षीर्ण हो चुका है। इससे इस विश्राम गृह के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। विश्राम गृह के चौकीदार रहे बर्ड़ोद निवासी स्व. रामजीलाल के पुत्र गंगादीन बसवाल ने बताया कि 1952 में इस विश्राम गृह महल को जयपुर स्टेट पीडब्ल्यूडी ने अपने अधीन ले लिया था। जयपुर स्टेट पब्लिक वर्क्स डिर्पाटमेंट विजिटर्स के अनुसार सन 1952 से 1985 तक सार्वजनिक निर्माण विभाग के अधिकारी इसको विश्राम के उपयोग में लेते थे। बसवाल ने बताया कि उसके पिता के निधन के बाद महल की सार संभाल नहीं हो सकी और लोग इसका गलत उपयोग करने लगे। यही नहीं इसमें रखा सामान भी गायब होने लगा। इससे धीरे धीरे इस विश्राम गृह का अस्तित्व खतरे में पड़ने लगा और आज यह खंडहर में तब्दील होने लगा है।

बर्ड़ोद. खंडहर में तब्दील हो रहा विश्राम गृह।

ऐतिहासिक महत्व

विश्रामगृह के चौकीदार रहे बर्ड़ोद निवासी स्व. रामजीलाल के पुत्र गंगादीन बसवाल ने बताया कि महाराजा जयसिंह अपने शासनकाल में शिकार के लिए बर्ड़ोद रूंध में अपने शाही लवाजमे के साथ आते थे। महाराजा जयसिंह ने इस शिकारगाह को एक रेस्ट हाउस के रूप में स्थापित किया था। महाराजा शिकार करने बाद रात्रि को इसी विश्राम गृह में आराम करके सुबह अलवर रवाना हो जाते थे। विश्राम गृह में ऊपर के हिस्से में चार बड़े हॉल, नीचे चार बड़े हाॅल दो सीढ़ियां, दो बरामदें और स्नानागार, शौचालय जैसी सभी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध थीं। महल के सामने एक बड़ा चबूतरा है जो पक्षी चुग्गा चुगने के काम आता था, महल के सामने कुआं है और एक पानी का बड़ा होद है जिसमें जानवरों के लिए पानी सुविधा थी। महल के दक्षिणी छोर में सात सुरक्षा कर्मियों के क्वाटर बने हैं।