कहीं जान ना ले ले सिलिकोसिस की बीमारी
बांसवाड़ा। पत्थरकी खदानों पर मजदूरी करने वाले श्रमिकों में सिलिकोसिस जैसी घातक बीमारी होने की आशंका है। इसकी पुष्टि चिकित्सा विभाग ने स्थानीय खदानों के मजदूरों की सेहत के बारे में कराई गई जांच से की है। जांच में मजदूरों को सिलिकोसिस से ग्रस्त होने की आशंका जताई गई है। जांच में टीबी जैसे लक्षण मिले हैं, लेकिन टीबी की पुष्टि नहीं हुई। उनमें लक्षण सिलिकोसिस जैसे मिले हैं। पिछले साल भी सिलिकोसिस के 7 संदिग्ध केस मिले थे। इधर, सरकारी आंकड़ों में सिलिकोसिस की बीमारी नहीं है, लेकिन सिलिकोसिस के सस्पेक्टेड केस जरूर मान रहे हैं। हाल ही में चिकित्सा इकाई द्वारा खदानों के आसपास कैंप लगाकर मजदूरों की जांच की। इसमें कई रोगियों में सिलिकोसिस जैसे लक्षण मिले हैं। इसके लिए संभावित मानते हुए उन्हें आगे की जांच के लिए लिए बुलाया गया, लेकिन श्रमिक जांच कराने के लिए अस्पताल नहीं आए और ही मेडिकल सुविधाएं ली।
कागजों में ही सुरक्षा
सरकारने खनन श्रमिकों की सेहत और सुरक्षा के लिए कई योजनाएं चलाई, जिनमें श्रमिकों को आवश्यक उपकरणों देने के साथ उनकी नियमित सेहत जांच का भी स्पष्ट प्रावधान है, लेकिन यहां तमाम योजनाएं बेअसर रही है। अधिकतर मजदूर खनन के वक्त मास्क ही नहीं लगाते हैं। सरकार द्वारा लगाने वाले शिविरों में भी स्वास्थ्य की जांच कराने नहीं पहुंचते। जो आते हैं, वे आगे की जांच के लिए अस्पताल नहीं आते। जिस कारण उनमें रोग की आशंका बढ़ जाती है।
क्या है सिलिकोसिस
जिलाक्षय रोग अधिकारी डॉ. पीके वर्मा के अनुसार सिलिकोसिस और टीबी अलग-अलग बीमारियां हैं। सिलिकोसिस में टीवी जैसे लक्षण जरूर दिखाई देते हैं, लेकिन टीबी का इलाज सिलिकोसिस में कारगर नहीं है। यह बीमारी लंबे समय तक खदानों में पत्थर तोड़ते रहने से होती है। इससे पीड़ित की मौत तक हो सकती है। इस बीमारी में मरीज को काला थूक और बलगम आना शुरू हो जाता है।
पत्थरों के कण-ऑक्सीजन की कमी
खननश्रमिक पहाड़ तोड़कर ज्यों-ज्यों अंदर जाते हैं, वैसे-वैसे ऑक्सीजन की कमी होती चली जाती है। पहाड़ों में 200 मीटर के भीतर पत्थर तोड़ने के दौरान उड़ने वाले कण हवा के साथ श्रमिकों के फेफड़ों में पहुंच जाते हैं। जिससे उनमें यह बीमारी होती है।
बीमारी के लिए वार्ड बना, आई मशीन
सरकारद्वारा सिलिकोसिस से बचाव के लिए अलग से वार्ड की स्थापना के लिए बजट स्वीकृत क