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वर्ष 17 } अंक 113 } महानगर } कुल पृष्ठ 20 } मूूल्य ~ 3.50 }रसरंग आज

7 वर्ष पहले
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मंदिरों और जटिल दर्शनशास्त्र की कोई आवश्यकता नहीं है। मस्तिष्क और हृदय ही हमारा मंदिर है। और दयालुता जीवन-दर्शन है।

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