नगर परिषद में आयुक्त आता नहीं, कार्यवाहक टिकता नहीं
एक्सईएन-एईएन को चार्ज देकर ही कामचलाऊ व्यवस्था में बीत गया साल, आयुक्त का कक्ष रहा खाली
भास्कर संवाददाता | बांसवाड़ा
शहरकी नगर परिषद में लंबे समय से स्थाई आयुक्त नहीं है। कांग्रेस और भाजपा के बोर्ड में ज्यादातर समय कार्यवाहक के रूप में ही काम चलाया गया। सवा साल पहले हुए नगर परिषद के चुनाव के बाद भी लंबे समय तक कोई भी अधिकारी आयुक्त के पद पर टिक नहीं पाया। आरएएस स्तर का कोई भी अधिकारी यहां आना नहीं चाहता। यह पद नगर परिषद बोर्ड में पक्ष और प्रतिपक्ष के पार्षदों के विरोध के बीच उलझकर रह गया है। इसके चलते एईएन प्रभुलाल भाबोर के भरोसे कुछ माह तक काम चलाया गया था।
इसी दौरान एक्सईएन के पद पर पदोन्नत होकर आए तरुण सिन्हा को कार्यवाहक आयुक्त का काम संभालने के लिए जैसे-तैसे राजी किया। इस दौरान चेक पावर का मामला अटका और सिन्हा ने कलेक्टर, सभापति और विधायक को कह दिया था कि वे आयुक्त का चार्ज लेना नहीं चाहते हैं। हालात यह है कि 9 जून 015 को आयुक्त मो. नसीम शेख के स्थानांतरण होने के बाद से अब तक आयुक्त नहीं है।
बोर्ड के साथ तालमेल बैठाकर काम करें
^इसपद पर सामंजस्य बैठाकर ही काम किया जा सकता है। प्रशासनिक व्यवस्था बरकरार रखने के लिए दबाव तो आएंगे, लेकिन इनके बीच आय बढ़ाने के प्रयास होने चाहिए। वित्तीय बदइंतजामी रोकने के लिए कार्यदक्षता दिखानी जरूरी है। बोर्ड समितियों की बैठकें समय पर होती रहे तो बहुत सारे मसले बातचीत से भी हल हो सकते हैं। सक्षम अधिकारी नहीं होने से न्यायिक काम भी प्रभावित होते हैं और नगर परिषद को हार का सामना करना पड़ता है। आरएएस स्तर के अधिकारी को काम करने देना चाहिए। आयुक्त को शहर में सफाई, ड्रेनेज, फोगिंग, उद्यानों का रखरखाव, रेवन्यू जनरेट करने-विकास, रोशनी व्यवस्था, विवाह पंजीयन, निर्माण स्वीकृति, जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने, अतिक्रमण चिह्नित कर हटवाने के काम को फोकस करना चाहिए। ये काम सिस्टम से होते रहे तो छोटा-मोटा विरोध कोई मायने नहीं रखता। -जैसा कि रिटायर्ड अधिशासी अधिकारी सुरेशचंद्र माहेश्वरी ने बताया
राजनीति दबाव के चलते कोई रुकना नहीं चाहता
^मेरीभी तमन्ना थी कि बांसवाड़ा जिले का निवासी होने और आरएएस अधिकारी होने के नाते आयुक्त रहकर शहर का समुचित विकास करूं। लेकिन 7 जुलाई 2008 को ज्वाॅइन करने के बाद जैसे-जैसे समय गुजरने लगा तो मुझ पर गलत काम करने का राजनीतिक दबाव तत्कालीन कुछ नेताओं द्वारा बढ़ने लगा। कार्यालय में कुछ नेताओं का अनावश्यक दखल और विभागीय कार्यवाही के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलने से काम प्रभावित होने लगा। मेरी सख्ती नेताओं को पसंद नहीं आई और मेरा तबादला करवा दिया। मेरी नौकरी के 7 वर्ष शेष थे, मैं अपनी नौकरी क्यों खराब करता। मुझे काफी दु:ख हुआ कि कुछ नेताओं ने निजी स्वार्थों के कारण मुझे आयुक्त के पद से 8 अक्टूबर 008 को हटा दिया। मेरी कार्यक्षमता का जनप्रतिनिधियों ने उपयोग नहीं किया। बाद में कई शहरों में आरएएस ऑफिसर रहा, लेकिन मन में ठीस रही कि कुछ समय मिलता तो शहर के लिए बहुत कुछ करता। -जैसाकि सेवानिवृत्त आयुक्त धीरजमल डिंडोर ने बताया
^मैंने आयुक्त का पदभार सभापति और उच्चाधिकारियों के आदेश पर कई बार कामकाजी व्यवस्था के तहत संभाला है। लेकिन जब मुझसे ऊपर का अधिकारी आता है, तो नियमानुसार स्वत: आयुक्त का पदभार उसी के जिम्मे हो जाता है। -प्रभुलालभाबोर, एईएन
^मैं एईएन से एक्सईएन के पद पर पदोन्नत हुआ हूं और मैं आयुक्त की सीट पर कैसे बैठ सकता था। सील पर हस्ताक्षर कर कैसे सकता हूं। हमें डीएलबी के उच्चाधिकारियों ने साफ मना कर रखा है। इसके लिए आरएएस स्तर का अधिकारी ही अधिकृत होता है। जिम्मेदारी सौंपी तो उसका निर्वहन किया। -तरुण सिन्हा, एक्सईएन-कार्यवाहकआयुक्त
^नगर परिषद में लोग रोजाना अपने कार्यों के लिए आते हैं। कुछ काम उसी दिन करने जरूरी होते हैं। ऐसे में यदि जिसे आयुक्त का चार्ज दिया हो, वो साइन करने में आनाकानी करे और कर्मचारियों के वेतन बिल भी पास नहीं करें, कैसे काम चलेगा। हम निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं और जनता-शहर के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। -मंजुबालापुरोहित, सभापति
सालभर में इतने बदले आयुक्त
{तरुणसिन्हा 31 जुलाई 015 से 1 सितं. 015
{प्रभुलाल भाबोर 1 सितं. 015 से 13 अक्टू. 015
{तरुण सिन्हा 14 अक्टू. 015 से 20 अक्टू. 015
{प्रभुलाल भाबोर 20 अक्टू. 015 से 20 नवं. 015
{महेंद्रसिंह टेलर 19 नवं. 015 से 30 नवं. 2015
{प्रभुलाल भाबोर 30 नवं. 015 से 11 जन. 016
{तरुण सिन्हा 11 जनवरी 016 से अब तक
असर-रूटीन का काम प्रभावित
आयुक्तनहीं होने से नगर परिषद में रोजाना भवन निर्माण स्वीकृति, भवन विस्तार, स्ट्रीप आॅफ लेंड, व्यावसायिक परिसराें के निर्माण की स्वीकृति के काम नहीं हो पाते। सक्षम अधिकारी के आवेदन-पत्र और राशि जमा अदायगी रसीद पर हस्ताक्षर जरूरी होते हैं। जिन लोगाें ने पिछले लंबे समय से भवन निर्माण, व्यावसायिक परिसर के लिए आवेदन किए, वे आयुक्त के नहीं होने से बैंक लोन की किश्तें चुकाने के चक्कर में निर्माण शुरू कर देते हैं, लेकिन बाद में बने हुए भाग और सेटबेक नहीं छोड़ने पर आपत्ति आती है। बोर्ड में नीतिगत फैसले प्रभावित होते हैं। पार्षदों की ही सुनवाई नहीं हो पाती।
कार्यवाहकके पास नहीं अधिकार
स्वायत्तशासनविभाग से डीडीओ पावर से लेकर जरूरी अधिकार नहीं मिलने से कार्यवाहक आयुक्त को कामकाजी दिक्कत होती है। आजादी-अधिकार नहीं मिलने से कार्यवाहक आयुक्त के रूप में अधिकारी काम करना पसंद नहीं करता रहा है। नगर परिषद की आय बढ़ाने के तरीकों पर काम ही नहीं हो पाता। पर्याप्त आय नहीं होने से नगर परिषद के कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिल पाता है। पिछले महीने 22 तारीख को तनख्वाह मिली। साथ ही तो नए कार्यों का निर्णय नहीं होता और ही नए कार्यों के प्रस्ताव बना पाते हैं, स्वीकृति के लिए राज्य सरकार पर दबाव डालना तो दूर की बात है।
नगर परिषद कार्यालय में कभी एईएन प्रभुलाल भाबोर तो कभी एक्सईएन तरुण सिन्हा को जबरन कार्यवाहक आयुक्त् का काम सौंपा गया, लेकिन अधिकार दोनों के पास नहीं होने से आयुक्त का कक्ष आबाद ही नहीं हो पाया।