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डाउनलोड करेंबांसवाड़ा। शहर से 21 किमी दूर। कुवानियां गांव। करीब डेढ़ किमी के पगडंडी रास्ते पर बसा विकलांग रकमाबाई का घर। चारों तरफ पहाडिय़ां ही पहाडिय़ां और इन बीच एक गुमनाम जिंदगी, जो आसरा ढूंढ रही है। अपने दर्द को हल्का करने के लिए उसे मदद का इंतजार है।
वह चाहती है उसके पैरों का इलाज हो ताकि वह अपने तीन बच्चों को ऊंचाइयों पर पहुंचा सके। रकमाबाई जिंदगी के 47 वर्ष गुजार चुकी है, फिर भी कुछ कर दिखाने की तमन्ना है। अपने बच्चों की तरक्की देखने की ललक है।
बस, वह चाहती है उसके पैर ठीक हो जाए। पति की मौत 25 वर्ष की उम्र में ही हो गई थी। वह उनके पीछे रकमा के साथ तीन बच्चे भी छोड़ गए। काफी संघर्ष और मजदूरी कर इनका लालन-पालन किया। लेकिन जीवन के 42वें वर्ष के पड़ाव में इस संघर्ष के बीच दोनों पैरों ने जवाब दे दिया। अब हर काम घसीट-घसीट कर करती है।
आश्रय सेवा संस्थान ने की मदद की पेशकश: रकमाबाई का दर्द कम करने आश्रय सेवा संस्थान के संरक्षक महेश गुप्ता, संस्था उपाध्यक्ष प्रगति उपाध्याय और समाजसेवी टीना पंड्या मौके पर गए। वे हालात देखकर हैरान रह गए। वहीं रकमा बाई भी पहली बार इन जंगलों के बीच शहर के कुछ लोग आते हुए देख घबरा सी गई। लेकिन जैसी संस्थान के सदस्यों ने मदद की बात की तो रकमा बाई के चेहरे पर हल्की रौनक दिखाई दी।
संस्थान ने गर्म कपड़े और भोजन सामग्री दी। वहीं दोनों पैरों का इलाज करवाने का आश्वासन भी दिया। इस दौरान संस्थान ने सुनाखोर गांव में निर्धन महिलाओं को वस्त्र वितरण, बच्चों को बिस्किट और जरूरी सामग्री भी बांटे।
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