300 करोड़ की सम्पत्ति पर भू-माफियाओं का कब्जा
बाड़मेरशहरआसपास की करीब 300 करोड़ की सरकारी जमीन पर अतिक्रमण है। 15 सालों से नगर परिषद ने सरकारी जमीन पर होने वाले अतिक्रमणों को हटाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए। अंधेरगर्दी के चलते सरकारी जमीन भूमाफियाओं के कब्जे में चली गई।
हकीकत यह है शहर में ऐसा कोई इलाका या कॉलोनी नहीं है, जहां कोई अतिक्रमण नहीं हो। जहां खाली जमीन दिखी भूमाफियाओं ने कब्जा किया और मालिक बन गए। चाहे वो गली-मोहल्ला हो या फिर नाडी, आगोर, पहाड़ी, श्मशान, टाउनशिप की सरकारी जमीन हो। नगर परिषद की अंधेरगर्दी के चलते कार्रवाई तो करना दूर, भूमाफियाओं के कब्जों पर पट्टे भी दिए। गौर से सोचे तो यह हम सब के लिए बड़ी चुनौती तो है ही साथ ही भविष्य के दौर की गंभीर समस्या भी है।
पहाड़ों पर बस रही कॉलोनियां... बाड़मेर.अतिक्रमण इस हद तक बढ़ गया है कि अब लोगों ने पहाड़ पर भी प्लॉट काट अतिक्रमण कर लिया। गडरारोड के नजदीक पहाड़ी जमीन पर किया गया अतिक्रमण।
^नगर परिषद की जमीन पर अतिक्रमण है। बैठक में भी अतिक्रमण हटाने की मांग उठी। इस गंभीर समस्या के लिए प्लान तैयार कर रहे है। 15 फरवरी के बाद शहर आसपास की बेशकीमती जमीन को अतिक्रमणमुक्त करने के लिए अभियान चलाएगा। -श्रवणविश्नोई, आयुक्त, नगर परिषद बाड़मेर
^अतिक्रमण बाड़मेर शहर की बड़ी समस्या है। नाडी, आगोर, श्मशान, टाउनशिप, गली-मोहल्लों से लेकर पहाड़ी भूमि तक लोगों ने अतिक्रमण किए है। इसके लिए परिषद को समय रहते कार्रवाई करनी चाहिए। यह शहर के लिए गंभीर समस्या है। बिना भेदभाव के ठोस कार्रवाई हो। -मेवारामजैन, विधायक बाड़मेर
...और कार्रवाई की सच्चाई
अतिक्रमणहटाने के लिए परिषद महज नोटिस देकर खानापूर्ति करती है। कभी कोई अधिकारी सख्ती दिखाता है तो राजनीति आड़े जाती है। ऐसे में लाखों वर्ग गज सरकारी जमीन पर कब्जे हो गए है।
जानिए अतिक्रमण की कहानी
ज्यादातरसरकारी जमीन पर अतिक्रमण बढ़ने की कहानी लगभग एक जैसी ही होती है। एक व्यक्ति द्वारा कब्जा करने के बाद उसकी आड़ में दूसरे लोग भी अतिक्रमण करने लग जाते हैं।
हकीकत यह है कि नगर परिषद को अतिक्रमियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने चाहिए थे, लेकिन मिलीभगत से कब्जे करने वालों को पट्टे देकर नियमन भी करवा दिया। अगर हालात ऐसे ही रहे तो आने वाले दिन बाड़मेर के लिए बेहद चिंताजनक होंगे। इसके लिए हम सब को जागरूक होने की जरूरत है, सोई हुई परिषद को भी जगाना होगा।
खसरा 1462, 1468, 1431, 1665, 1434 सरकारी जमीन है। खसरा 1431 गेंहूं रोड पर करीब 100 बीघा सरकारी जमीन पर अतिक्रमण है। वर्ष 2009 में इस जमीन को अतिक्रमणमुक्त करने के लिए तत्कालीन कलेक्टर, पुलिस और नगर परिषद ने संयुक्त कार्यवाही भी की थी। नगर परिषद ने कब्जे हटाए, लेकिन फिर से अतिक्रमण कर कर लिया।
दरअसल शहर और आसपास की बेशकीमती सरकारी जमीन पर भूमाफियाओं की नजर शुरूआत से रही है। खाली जमीन को देख पत्थर गाड़ अतिक्रमण कर लेते है। देखते ही देखते स्टांप पर प्लॉट बेच, पट्टे भी बना लेते है। कितनी शिकायतें करों, परिषद को कोई फर्क नहीं पड़ता है।
अतिक्रमियों ने नाडी और आगोर तो क्या श्मशान और पहाड़ी भूमि को भी नहीं छोड़ा। पहले कब्जा किया, फिर स्टांप पर आगे बेच दी और हो गया पक्का कब्जा। फिर क्या अंधेरगर्दी में डूबी नगर परिषद में स्टांप पर कब्जा दिखाते हुए पट्टा भी ले लिया। नगर परिषद के अधिकारियों ने तो मौका देखा और ही हालात। इतना ही परिषद के अधिकारियों ने साथ मौजूद रहकर जमीन का नियमन भी करवा दिया।
नगर परिषद की ओर से सदर थाने के बाद 365 बीघा जमीन पर सरकारी कॉलोनी बसाए जाने के लिए टाउनशिप का प्रोजेक्ट तय किया था। इसमें 1273 भूखंड परिषद को नीलाम करने थे, लेकिन केवल 114 भूखंड ही नीलाम किए, इसके अलावा 38 भूखंडों पर पूर्व कब्जाधारियों को विस्थापित कर दिया। शेष रहे 1121 भूखंडों पर लोगों ने अतिक्रमण कर लिया और आधे से अधिक लोगों ने परिषद से पट्टे भी बना लिए। करीब 80 करोड़ की जमीन अतिक्रमण की भेंट चढ़ गई, अब तक कई आयुक्त आए और गए, लेकिन किसी ने टाउनशिप से अतिक्रमणमुक्त नहीं किया। इसके अलावा होटल, स्कूल, सामुदायिक सभा भवन, पार्क, अस्पताल, शॉपिंग मॉल की जमीन पर भी अतिक्रमण हो रहे है।
शहर में आज भी ऐसी हजारों वर्ग गज जमीन है, जो नगर परिषद के रिकार्ड में दर्ज है। हकीकत यह है कि मौके पर कॉलोनियों आबाद हो चुकी है। सैकड़ों की संख्या में पक्के मकान बन गए। नगर परिषद से आवेदन कर लोगों ने ऐसी जमीन के पट्टे भी ले लिए। ऐसी जमीन को गिरोह के रूप में लोगों ने प्लॉटिंग कर बेच दी और परिषद आंखें मूंदे देखती रही।