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मशविरे के वास्ते दरख्वास्त करने के ट्रस्टी के अख्तियार

7 वर्ष पहले
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प्रश्न यह उत्पन्न होता था कि अगर कोई ट्रस्टी इस एक्ट की दफा-25 के अनुसार दिए गए हुक्म को नहीं माने तब उसके विरुद्ध क्या कार्रवाई की जा सकती थी? इस प्रश्न का माकूल जवाब, दफा-26 में दे दिया गया था और वांछित कार्रवाई के प्रावधान कर दिए गए थे, जिन्हें आगे दिए गए ब्यौरे से समझा जा सकता है। दफा-26 : अगर कोई ट्रस्टी बिना किसी माकूल उजर के दफा 25 के जिमन (5) के मुताबिक दिए हुए हुक्म की तामील करे तो, वगैरह रुकावट डाले हुए किसी दूसरी सजा में या जिम्मेवारी में जिसका कि वह किसी ऐसे कानून के मुताबिक जो वक्त पर जारी हो मुस्तेजिब हुआ हो, उसके बारे में समझा जाएगा कि उसने नकजे अमानत की है जिससे उसके ऊपर मजमूआ जाब्ता दीवानी, रियासत बीकानेर, सन् 1920 ई. की दफा- 79 के अनुसार मुकदमा चलाने के लिए वजह पैदा हुई है, और कोई ऐसा मुकदमा, जहां तक उसकी बिनाय यह हो कि ट्रस्टी ने हुक्म की तामील नहीं की है, रेवेन्यू कमिश्नर की पहिले मंजूरी हासिल किए बिना चलाया जा सकता है।

इस एक्ट की दफा-27 का संबंध, मशविरे के वास्ते दरख्वास्त करने की ट्रस्टी के अख्तियारों से था। दफा- 27 (1) : सिवाय उस सूरत के जिसका जिक्र आगे चल कर वफा-28 में है, ट्रस्टी को अख्तियार होगा कि उस अदालत डिस्ट्रिक्ट जज में, जिसकी हद समाअत की मुकामी हदूद के अंदर किसी खैराती या मजहबी धर्मादे की संपत्ति का कोई ज्यादातर हिस्सा वाकै हो, अर्जी दाखिल करके धर्मादे की संपत्ति के इंतजाम या अहतमाम पर असर रखने वाले किसी कानूनी सवाल की निस्बत ऐसी अदालत की राय या सलाह या मशविरा हासिल करने के लिए दरख्वास्त करे, और अदालत उस पर अपनी राय या सलाह या मशविरा, जैसी कि सूरत हो, देगी। (लगातार)