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संस्कृति की संवाहिका है हमारी भाषा

7 वर्ष पहले
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बीकानेर। हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर हिन्दी विश्व भारती अनुसंधान परिषद के सभा कक्ष में हिन्दी दिवस की महत्ता और वर्तमान में हिन्दी के प्रयोग विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि प्रभा भार्गव ने हिन्दी को जन-जन भाषा है। बताया। विशिष्ट अतिथि संजय पुराेहित ने कहा कि हिन्दी को विदेशी कॉलोजों विश्वविद्यालयों में लागू करवाने के प्रयास होने चाहिए। अध्यक्षता करते हुए भवानीशंकर व्यास विनोद ने कहा कि‌ हमारी भाषा संस्कृति की संवाहिका है।

साहित्यकार रामनरेश सोनी ने कहा कि 1947 में हिन्दी को लेकर सही निर्णय लिया होता तो हमारे ऊपर अंग्रेजी का बोझ नहीं होता। ब्रह्माराम चौधरी ने कहा कि हिन्दी आज की भाषा नहीं है। इसका प्रयोग शताब्दियों पूर्व भी होता था। डॉ. मनमोहनसिंह यादव ने दिक्षण पूर्व राज्यो में हिन्दी शुरू ही बातचीत को अच्छा सिलसिला बताया। बीडी जोशी ने स्वतंत्रता गणतंत्र दिवस की तरह हिन्दी दिवस को याद करने की बात कही। जितेन्द्र यादव ने जिला स्तर पर न्यायालयों में दिए जाने वाले निर्णयों को हिन्दी में देने की बात कही।

गौरीशंकर मधुकर ने अंग्रेजी भाषा के हमारे भीतर तक घुसने को व्यंग्यात्मक कविता के माध्यम से बया किया। नदीम अहमद नदीम ने हिन्दी भाषा से अपनी अंतर आत्मा से स्नेह करने की बात कही। संयोजन करते हुए आत्माराम भाटी ने कहा कि हिन्दी को कमजोर मानना ठीक नहीं। उन्होंने कहा कि देश में ही नहीं विदेशों में भी हिन्दी फिल्मों का बोलबाला है। आगंतुकों का आभार अनुसंधान परिषद के मानद निदेशक डॉ. गिरिजाशंकर शर्मा ने किया।

(हिन्दी विश्वभारती की ओर से आयोजित संगाष्ठी में बोलते अतिथि।)