दरख्वास्त का मजमून और उसकी तस्दीक
बीकानेर इितहास दर्शन
सरोकार रखने वाले किसी शख्स को यह अख्तियार था कि वह अर्जी दाखिल करके एक ऐसा हुक्म हासिल करने की दरख्वास्त कर सके जिसमें नीचे लिखी तमाम या कोई हिदायत दर्ज हो, यानि (1) ट्रस्टी को इस बात की हिदायत की जाए कि वह सायल को ऐसी अदालत की मार्फत ऐसे धर्मादे की किस्म और उद्देश्य और ऐसे धर्मादे की संपत्ति की मालियत और हालत और इंतजाम और इस्तेमाल और उसकी आमदनी के, या इन बातों में से किसी एक बात के, मुताल्लिक तफीसीलें बतलाएं, और (2) इस बात की हिदायत की जाए कि ऐसे धर्मादे के हिसाब-किताब की जांच-पड़ताल की जाए, मगर शर्त यह है कि जो हिसाब किताब दरख्वास्त की तारीख से तीन साल पहले के हों उनकी निस्बत कोई शख्स इस तरह की हिदायत के वास्ते दरख्वास्त नहीं कर सकेगा, और यह भी शर्त है कि कोई शख्स किसी ऐसी हिदायत के वास्ते तब तक दरख्वास्त नहीं कर सकेगा जब तक कि ट्रस्टी से बाला वाला जरूरी इत्तला हासिल करने में वह खुद नाकामयाब हो चुका हो और कोई ऐसी दरख्वास्त अदालत डिस्ट्रिक्ट जज तब तक मंजूर नहीं करेगी जब तक कि उसमें दरख्वास्त देने वाले का बयान इस मतलब का हो कि वह इस तरह नाकामयाब हो चुका है।
एक्ट की दफा-24 का संबंध, दरख्वास्त के मजमून और उसकी तस्दीक से था। दफा-24 (1) दरख्वास्त में यह बात दर्ज होनी चाहिए कि सायल किस बिनाय पर दावा करता है कि वह सरोकार रखने वाला शख्स है और जहां तक मुमकिन हो उसमें इस बात की तफसील होनी चाहिए कि वह किन मामलात की निस्बत इत्तला चाहता है और कौन से हिसाब-किताब की जांच-पड़ताल करवाना चाहता है। (2) दरख्वास्त लिखित होनी चाहिए और उसमें दस्तखत और इबारत तस्दीक उसी तरीके से दर्ज होनी चाहिए कि जो मजमूआ जाब्ता दीवानी, रियासत बीकानेर, सन् 1920 ई. में दस्तखत तस्दीक अर्जी-दावा के वास्ते मुकर्रर है। (लगातार)