अपील के प्रावधान का अभाव
एक्ट की दफा-28 में \\\"बचाव\\\' संबंधी आम-अहकाम का समावेश किया गया था। दफा-28: इस एक्ट की दफा-23 या 27 के मुताबिक किसी खैराती या मजहबी धर्मादे के बारे में दी हुई कोई दरख्वास्त नीचे लिखी किसी भी सूरत में मंजूर नहीं की जाएगी, यानी- (क) अगर मजमूआ जाब्ता दीवानी, रियासत बीकानेर, सन् 1920 ई. की दफा-79 के मुताबिक ऐसे धर्मादे के मुताल्लिक दायर की हुई कोई नालिश जेर मजहबी हो: (ख) अगर ऐसे धर्मादे की सम्पत्ति खैराती और मजहबी धर्मादे की सम्पत्ति के अहतमाम के रास्ते कोई स्कीम (बन्दोबस्त) किसी अदालत मजाज ने या किसी दूसरे हाकिम ने, जो इस एक्ट या दूसरे किसी एक्ट के अहकाम की रु से कार्रवाई कर रहा हो, तै कर दी हो या मंजूर कर ली हो।
एक्ट की दफा-29 का ताल्लुक मजमूआ जाब्ता दीवानी के अहकाम लागू होने से था, जिसे आगे के ब्यौरे के अवलोकन से समझा जा सकता है। दफा-29 (1): मजमूआ जाब्ता दीवानी, रियासत बीकानेर, सन् 1920 ई. के अहकाम जो नीचे लिखी बातों के बारे में हैं, यानी- (क) सबूत वाकेआत बजरिए हलफनामा, (ख) किसी शख्स को जबरन हाजिर कराने और उसका इजहार हलफी लेने, (ग) दस्तावेजों को जबरन पेश कराने, जाहिर कराने, और उनका मुआयना कराने, और (घ) इजराय कमीशन, इस बाब के अनुसार जो तमाम कार्रवाईयां की जाए उनके बारे में लागू होंगे और सम्मन की तामील कराने के मुताल्लिक जो अहकाम हैं वे इस बाब के मुताबिक नोटिस की तामील के बारे में लागू होंगे।
(2) डिग्रियों की इजराय के बारे में उस मजमूआ के अहकाम, जहां तक लागू किए जा सकते हों, इस बाब के मुताबिक दिए गए हुक्मों की इजराय के बारे में लागू होंगे। दफा-30 इस बाब के मुताबिक दिए गए किसी हुक्म के खिलाफ, या दी गई किसी राय या सलाह या मशविरे के खिलाफ, कोई अपील नहीं हो सकेगी। (लगातार)
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