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मुगल संरक्षण के दौर में परोक्ष तथा अपरोक्ष रूप से प्रभावित हुआ बीकानेर का राजपद

5 वर्ष पहले
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हमने पूर्व में इस विषय पर चर्चा की थी कि किस तरह से बीकानेर नरेश राव कल्याणमल को अपना उद्देश्य पूरा करने में मारवाड़ के शासक राव मालदेव के विरुद्ध दिल्ली के शासक शेरशाह से भी सहायता मिली थी। दयालदास की ख्यात में आए संदर्भों से यह बात संपुष्ट होती है कि ठाकुरों/सरदारों के सहयोग से राव कल्याणमल ने दुबारा प्राप्त राज्य को स्थिरता प्रदान की थी। यहां पर दिल्ली की अफगान सत्ता से प्राप्त सहयोग ने क्षेत्रीय संदर्भ में इस तथ्य को मजबूती से सामने रखा कि केन्द्रीय सत्ता के संरक्षण में स्थानीय शक्तियों को सुरक्षा प्राप्त हो सकती है। संभवतया इसी सच्चाई से रूबरू हो चुके बीकानेर के राठौड़ राजघराने ने कालांतर में पहले मुगलों का और तदनंतर अंग्रेजों का संरक्षण प्राप्त करने में अपनी भलाई समझी थी।

बीकानेर राज्य के संदर्भ में देखने पर हमें यह दृष्टिगत होता है कि सन् 1570 ई. के बाद बीकानेर राज्य में राजपद का विकास एक नए परिवेश और स्वरूप में होना शुरू हो गया था। मुगल बादशाह अकबर की सन् 1570 ई. की नागौर यात्रा के दौरान तत्कालीन बीकानेर नरेश राव कल्याणमल का नागौर जाकर वहां पर मुगल बादशाह अकबर की सेवा में उपस्थित हो जाना तथा मुगल अधीनता स्वीकार कर लेना, इस दिशा में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन बिंदु था।

तत्पश्चात बीकानेर का राजघराना मुगलों के सन्निकट आता चला गया। बीकानेर के शासक मुगल बादशाहत के विश्वस्त मनसबदार ओर स्थाई स्तंभ बन कर मुखरित हुए। दिल्ली की मुगल बादशाहत के निकट सामिप्य ने मुगल बादशाहत की स्वेच्छाचारी, निरंकुश और संप्रभु प्रकृति ने बीकानेर के शासकों को परोक्ष तथा अपरोक्ष दोनों रूप में प्रभावित किया तथा बीकानेर राज्य की राजनीतिक व्यवस्था और संगठन उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। इससे बीकानेर राज्य का राजपद भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाया। (लगातार)

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