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कोषाध्यक्ष के फर्ज अख्तियारों की हद

7 वर्ष पहले
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इस एक्ट की दफा- 40 का संबंध कोषाध्यक्ष को सुपुर्द की हुई संपत्तियों की फहरिस्त को सालाना प्रकाशित किए जाने संबंधी प्रावधान से था, जो इस प्रकार थी : दफा- 40 : खैराती और मजहबी धर्मादों का कोषाध्यक्ष कुल ऐसी संपत्ति की फेहरिस्त, जो इस बाब की रु से वक्त पर उसके सुपुर्द हो, और पिछली दफा की जिमन-2 के मुताबिक रखे हुए तमाम हिसाबात का खुलासा हर साल ऐसे समय पर बीकानेर-राजपत्र में प्रकाशित करता रहेगा, जैसा कि श्रीजी साहब बहादुर की गवर्नमेंट हिदायत करें।

एक्ट की दफा-41 में कोषाध्यक्ष के फर्ज अख्तियारों की हद को रेखांकित किया गया था, जिनका विवरण आगे दया जा रहा है। दफा-41 (1) : खैराती और मजहबी धर्मादे का कोषाध्यक्ष हमेशा ट्रस्टी बना रहेगा और ऐसे ट्रस्टी की हैसियत में कोई उसका शरीक नहीं होगा, और ऐसे कोषाध्यक्ष की हैसियत में वह, सिवाय इस बाब के अहकाम के मुताबिक, और किसी तरह, किसी संपत्ति को अपने अहतमाम में नहीं लेगा या रखेगा, और उसको अख्तियार होगा कि उसको सुपुर्द की हुई किसी संपत्ति को किसी बिनाय पर मुंतकिल करे सिवाय उस डिग्री की तामील में जिसमें संपत्ति उसके कब्जे से निकल जाने का हुक्म हो या उस हाकिम के हुक्म की तामील में जिसने संपत्ति को उसके सुपुर्द करने का हुक्म सादिर किया हो।

(2) ऐसे हुक्म के जरिये कोषाध्यक्ष को यह हिदायत की जा सकती है कि वह उसको सुपुर्द की हुई किसी संपत्ति को बेच दे या किसी और तरह मुंतकिल कर दे, और उस हाकिम की मंजूरी हासिल करके जिसने हुक्म मजकूर सादिर किया हो, उस रुपए को, जो संपत्ति को इस तरह बेचने से या और तरह मुंतकिल करने से हासिल हुआ हो, किसी ऐसी किफालत जर की खरीद में, जिसका जिक्र दफा-36 के जिमन- (3) के फिकरा (क), (ख), (ग), (घ) या (ड़) में किया गया है, या स्थावर संपत्ति की खरीद में लगाए। (लगातार)