खातेदारों की उम्मीदों पर पानी फिरा
बीकानेर में सरकार की घोषणा के बाद जिप्सम का खनन पट्टा हासिल करने का सपना संजोए खातेदारों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। छह माह में एक भी खातेदार को खनन पट्टा नहीं मिला और अब केन्द्र से पर्यावरण क्लियरेंस लेना भी जरूरी हो गया है जिससे उम्मीदें क्षीण हो गई हैं।
जुलाई में राज्य सरकार ने बीकानेर में कैबिनेट मीटिंग में निर्णय लेकर घोषणा की थी कि जिसकी जमीन में जिप्सम है, उन खातेदारों को जिप्सम का खनन पट्टा दिया जाएगा। इसके लिए स्वयं के प्लांट में ही जिप्सम का उपयोग करने की शर्त भी हटा ली गई थी। सरकार की इस घोषणा से खातेदारों और पीओपी फैक्ट्री मालिकों की बाछें खिल गई थी।
खान एवं भूविज्ञान विभाग में जिप्सम का खनन पट्टा लेने के लिए 500 से ज्यादा लोगों ने आवेदन कर दिए, लेकिन छह माह बीत जाने के बावजूद एक भी खातेदार को पट्टा नहीं मिल पाया है। इसके अलावा केन्द्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने सात अक्टूबर को अधिसूचना जारी कर पांच हेक्टेयर से कम क्षेत्र में खनन पट्टों के लिए भी पर्यावरण क्लियरेंस जरूरी कर दिया। इससे खातेदारों के लिए जिप्सम का खनन पट्टा हासिल करना टेडी खीर हो गया है। केन्द्र के पर्यावरण मंत्रालय से क्लियरेंस हासिल करने की प्रक्रिया जटिल है, पैसा भी खर्च होता है और एक साल से ज्यादा का समय लग जाता है।
पहले क्या था
पूर्वमें पांच हैक्टेयर या उससे ज्यादा क्षेत्र में प्रधान खनिज के पट्टे के लिए ही केन्द्र के पर्यावरण मंत्रालय से क्लियरेंस लेना जरूरी था। जिप्सम की खानों के पट्टे पांच हेक्टेयर से कम क्षेत्र के होते हैं। इसलिए निजी क्षेत्र में भी खनन पट्टा लेना मुश्किल नहीं था।
अबक्या है
अबपांच हेक्टेयर से कम क्षेत्र की खानों का पट्टा हासिल करने के लिए भी केन्द्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय से क्लियरेंस लेना जरूरी हो गया है। इससे निजी क्षेत्र में, खासकर खातेदारों के लिए जिप्सम का खनन पट्टा हासिल करना मुश्किल हो गया है। केन्द्र से क्लियरेंस लेने की प्रक्रिया लंबी और खर्चीली है जो खातेदारों के बस की बात नहीं।
सरकारको करना होगा
50हेक्टेयर से कम क्षेत्र की खानों का पट्टा जारी करने के लिए पर्यावरण क्लियरेंस राज्य सरकार दे सकती है, लेकिन इसके लिए बोर्ड गठित करना होगा। बोर्ड में शामिल लोगों के नाम राज्य सरकार केन्द्र को भेजेगी और केन्द्र की स्वीकृति के बाद