‘पल पल राह देखती मां है आंसू धार ...’
बेटा छोड़ गया सात समंदर पार। पल-पल राह देखती मां है आंसू धार। जैसी काव्य पंक्तियों के माध्यम से महान इटालियन डॉ. एल.पी. टैक्सीटोरी की मां की पीड़ा को स्वर देते हुए उन्हें नमन किया कवि लक्ष्मीनारायण रंगा ने। अवसर था प्रज्ञालय संस्थान और राजस्थानी युवा लेखक संघ के संयुक्त रूप से आयोजित डॉ. टैस्सीटोरी की 126वीं वर्षगांठ पर उनकी समाधि स्थल पर आयोजित पुष्पांजलि त्रिभाषा काव्य गोष्ठी का कार्यक्रम।
शायर शमीम बीकानेर ने ‘ताजमहल’ के हालातों को लेकर आजाद नज्म प्रस्तुत करते हुए ने ग़ज़ल के शेर-पीलेपन पर हो गया हरियाली का अंत...। युवा कवि संजय पुरोहित ने राजस्थानी कविता ‘चंदन खेजड़ अेक बरोबर...’ पेश की। कवि आनंद वी. आचार्य ने सस्वर राजस्थानी गीत ‘दूर सूं ही चोखा लागे...’ से काव्य गोष्ठी मं नया रंग भरा तो कवि गिरधारी दान रतनू ने राजस्थानी और राजस्थान के वैभव को हमारे सामने रखा। कवि जुगल पुरोहित ने डॉ. टैस्सीटोरी पर केन्द्रित कविता का वाचन किया। वहीं कवि गोविंद नारायण राजपुरोहित ने नगर गौरव को रेखांकित करते हुए प्रस्तुति दी। युवा कवि हरीश बी. शर्मा ने ‘बोल हजूरा बोल...’, शायर जाकिर अदीब ने अपनी रचना के माध्यम से मिट्टी को प्रतीक बनाकर युग यथार्थ से रूबरू कराया। कथाकार कमल रंगा ने राजस्थानी कविता ‘पूठो’ के साथ डॉ. टैस्सीटोरी को माध्यम बनाने वालों पर एक व्यंग्य कविता ‘म्हैं नीं नींद में। म्हैं नीं नीं गफलत में।’ की बानगी रखी। कवि लालचंद जैदिया ने ‘बेइमानों की भीड़ में कहां गया इंसान’ रचना प्रस्तुत की। कवि राजाराम स्वर्णकार, डॉ. बरहमा राम चौधरी ने कविता पेश की। शायर कासिम बीकानेरी ने गजल के माध्यम से सामाजिक सरोकार और जीवन संघर्ष को रेखांकित किया तो कवि नरपत सिंह सांखला ने अपनी रचना के माध्यम से दायित्व बोध को उजागर किया। कार्यक्रम के अध्यक्ष कृष्णशंकर पारीक ने कहा कि प्राथमिक शिक्षा का माध्यम राजस्थानी हो और राजस्थानी को संवैधानिक और दूसरी राजभाषा का हक शीघ्र मिले। गोष्ठी में प्रमुख रूप से सरदार अली पडि़हार, मो. फारूख, शिवशंकर भादाणी, राहुल आचार्य, देवीलाल आदि ने डॉ. टैस्सीटोरी को नमन किया।
डॉ. एल.पी. टैक्सीटोरी की समाधि पर पुष्प अर्पित करते साहित्यकार।