बीकानेर। पेंशन डायरियों से फर्जी तरीके से 54 लाख 73 हजार रुपए भुगतान उठाने के डेढ़ साल पुराने मामले में सदर थाना पुलिस ने गुरुवार को अदालत में आरोपी के खिलाफ चालान पेश कर दिया। आरोपी सुनील जैन पिछले करीब डेढ़ माह से जेल में बंद है।
सहकारी उपभोक्ता होलसेल भंडार में सेल्स मैन के रूप में काम करते हुए सुनील जैन पर 54 लाख 73 हजार रुपए के गबन का आरोप है। वर्ष 2006-07 की ऑडिट में इसका खुलासा हुआ था। यह ऑडिट 2013 में हुई थी। उसके आधार पर भंडार के सुपरवाइजर शक्ति सिंह की ओर से सदर थाने में जैन के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करवाई गई।
पुलिस आरोपी को गिरफ्तार करने उसके घर पहुंची लेकिन वह फरार हो गया। पुलिस उसे पकड़ने मुम्बई तक गई। इस दौरान जैन हाई कोर्ट में चला गया। कोर्ट के आदेश पर उसे बीकानेर के स्थानीय कोर्ट में दिसंबर 2014 में समर्पण कर दिया।
उसके बाद सही वह जेल में बंद है। प्रकरण की जांच कर रहे सदर थाने एसआई लालचंद ने गुरुवार को जैन के खिलाफ कोर्ट में चालान पेश कर दिया। एसआई ने बताया कि फाइल हाई कोर्ट में होने के कारण चालान में विलंब हुआ है। जैन भंडार से बर्खास्त किया जा चुका है।
गबन के और भी हैं मामले
सहकारी उपभोक्ता होलसेल भंडार में सेल्स मैन रहते हुए सुनील जैन ने लाखों के वारे न्यारे किए। उसके खिलाफ 2007-08 की ऑडिट में 75 लाख रुपए के गबन का एक और मामला सामने आया है। इसी प्रकार वर्ष 2008-09 की ऑडिट भी हो चुकी है। उसमें भी पेंशन डायरियों के माध्यम से फर्जीवाड़ा कर लाखों का हेरफेर किया गया है।
इसके अलावा वर्ष 2005-06 की ऑडिट अभी चल रही है। इससे पूर्व वर्ष 2009 में हुई एक माह की ऑडिट में जैन की करीब दस लाख रुपए की रिकवरी निकली थी, वह रकम जैन ने भंडार को जमा करवा दी थी। इन सालों में सुनील जैन भंडार की पीबीएम अस्पताल स्थित पेंशनर शॉप पर बतौर सेल्समैन कार्यरत रहा है।
कैसे किया गबन
जिलाकोष कार्यालय की ओर से भंडार के बिलों की ऑडिट के दौरान रोचक खुलासे हुए। पीबीएम अस्पताल में भर्ती रोगियों की पेंशन डायरी पर दवाइयां देने की कोई लिमिट नहीं होती। बस सरकार की इसी कमी का बेजा फायदा सुनील जैन ने उठाया। आरोप है कि जैन ने पेंशन डायरियों के उन पन्नों की फोटो कॉपी करवा लेता, जिसमें डॉक्टर दवाएं लिखता था।
यह काम रोज होता। हर दिन शाम को पांच और छह बजे के दरम्यान बिल बनते थे और भंडार के माध्यम से भुगतान के लिए ट्रेजरी भेजे जाते। अचरज की बात यह है कि भंडार ने कभी इन बिलों पर आपत्ति नहीं की। उन सालों में हर महीने भंडार को औसत 80-80 लाख का भुगतान होता था। भंडार के बिल हजारों की संख्या में होते थे और ट्रेजरी में बिलों की जांच करने का कोई सिस्टम नहीं था।
दो सौ रुपए मानदेय पर एक अकाउंटेंट बिल पास करने के लिए रखा हुआ था। वर्ष 2013 में जब लाखों रुपए के गबन के खुलासे हुए तो तत्कालीन कोषाधिकारी संजय धवन ने भंडार से करीब डेढ़ करोड़ की रिकवरी की। जबकि भंडार अब तक एक भी पैसे की रिकवरी नहीं कर सका।