जाबता-असवारों की संख्या का निर्धारण ?
हमारे देखने में यह भी आता है कि पट्टे के क्षेत्र की भौगोलिक तथा आर्थिक स्थिति पर यह निर्भर करता था कि कौन से सैनिक चाकरी के लिए चुने गये 7 “”जाबता - असवार ‘’ की संख्या किस आधार पर निर्धारित की गई थी, इसका विवरण हमें प्राप्त नहीं होता है। बीकानेर-राज्य की पट्टा बहियों में गांवों की संख्या के पीछे “”जाबता असवारों’’ की संख्या लिख दी गई है। पट्टे और चाकरी के मध्य संबंध स्थापित करने के लिए बीकानेर राज्य में अपने पड़ोसी राज्य मारवाड़ की तरह “”रेख प्रथा’’ का प्रचलन नहीं था।
यद्यपि, अठारहवीं शताब्दी अंत में अवश्य पट्टों की कुल आय के संदर्भ में “रेख’ शब्द का प्रयोग किया गया है, परंतु वह कुछ ही गांवों के लिए प्रयोग में लाया गया है। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में यह प्रयोग भी बंद हो गया है। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि ख्यातार दयालदास सिंढ़ायच ने अपने किसी भी ग्रंथ में बीकानेर के संदर्भ में “रेख’ शब्द का प्रयोग नहीं किया है। जबकि उसने गांवों सैनिक दायित्वों या करों का पूरा विवरण दिया है। लगभग यहीं हाल अभिलेखीय स्रोत-सामग्री का भी है।
बीकानेर राज्य के मरुस्थलीय तथा रेगिस्तानी वातावरण के फलस्वरूप यहां पर पड़ने वाले निरंतर अकालों तथा जनसंख्या की कमी की समस्या ने इस क्षेत्र को सदैव ही आर्थिक अस्थिरता से ग्रस्त क्षेत्र बनाये रखा। संभवत: इसी कारण गांव की “जमा’ अथवा “रेख’ अनुमानित करके ही “”जाबता असवारों’ को निर्धारित कर दिया जाता था। समकालीन ऐतिहासिक स्रोत-सामग्री में केवल “”जाबता असवारों ‘’ के ही उल्लेख से यह भी जान पड़ता है कि इनके आगे गांवों की अनुमानित आय का मापदंड अपने दायरे में काफी विस्तृत रहा होगा (लगातार)