दो तरह के पट्टायत होते थे पूर्ववर्ती बीकानेर राज्य में
संभवत: शासक की अपने सामंतों तथा पट्टायतों से यही मुख्य अपेक्षा भी थी। ये \\\"\\\"नातेदार\\\'\\\' सामंत ही शासक की सेना के मुख्य स्तंभ हुआ करते थे तथा केन्द्रीय सत्ता से संबंध बिगड़ने की स्थिति में एवं राज्य के विभिन्न जातियों। समूहों द्वारा विद्रोह करने पर उसके विश्वसनीय \\\"\\\"सहायक\\\'\\\' होते थे। इनकी सत्ता को मिटा देने या इन्हें निर्मूल कर देने से शासक के स्वयं के राजनीतिक सांस्कृतिक आधार के लिए खतरा पैदा हो सकता था। अधिक से अधिक, शासक इन्हें अंकुशित एवं नियंत्रित रखने तथा इनमें शक्ति संतुलन बनाये रखने की नीति पर चल सकता था।
परंतु, इस मूल ढांचे में परिवर्तन नहीं करने की शासकों की नीति का एक दुष्परिणाम यह निकला कि अठारहवीं शताब्दी में मुगल संरक्षण के समाप्त हो जाने पर सामंतों को अपनी खोई हुई शक्ति प्रतिरुप को प्राप्त करने का अाधार मिल गया। फलस्वरूप राज्य में विद्रोह बढ़ गये। पूर्ववर्ती बीकानेर राज्य में पट्टायत दो प्रकार के थे। प्रथम, \\\"\\\"आसामीदार-चाकर-पट्टायत\\\'\\\' तथा द्वितीय, \\\"\\\"चाकर-पट्टायत\\\'\\\'। इनमें से \\\"\\\"आसामीदार चाकर पट्टायत\\\'\\\' वे पट्टायत थे, जिनके ठिकाणे राव बीका के राज्य की स्थापना के साथ ही स्थापित हो चुके थे तथा परवर्ती काल में बीका-खांप के सदस्यों के नये ठिकाणे बांधे गये। उन ठिकाणों पर चूंकि इनके वंशानुगत एवं क्षेत्रीय अधिकारों को मान्यता दी जाती थी, इसलिए ये लोग आसामीदार-चाकर-पट्टायत कहलाते थे।
इसके विपरीत, \\\"\\\"चाकर-पट्टायत\\\'\\\' साधारण श्रेणी के थे। इन्हें, शासक के द्वारा चाकरी के बदले पट्टे प्रदान किये जाते थे। इनके पट्टे, चाकरी के साथ ही बने रह सकते थे। इन पट्टायतों का अपने क्षेत्र-विशेष पर कोई पैतृक या वंशानुगत दावा या अधिकार नहीं होता था। केवल शासक की स्वीकृति से ही ये पट्टे वंशानुगत हो सकते थे। अपनी स्थिति को बनाये रखने के लिए ये शासक की कृपा पर पूर्ण आश्रित थे। इनका अपना किसी तरह का कोई भी दावा नहीं होता था। लगातार