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राज्य में शासक की स्थिति को सुदृढ़ किया पट्टा प्रणाली ने

5 वर्ष पहले
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बीकानेर राज्य में पट्टा-प्रणाली के प्रचलन में आने का यह तात्पर्य यह कदापि नहीं था कि, पुराने कुलीय ढ़ांचे का अंत हो गया तथा उसका स्थान एक नई व्यवस्था ने ले लिया। राज्य का सामंत वर्ग अभी पुराने ठाकुरों की धरोहर था तथा उनकी कुलीय मान्यताएं अभी भी उनके अधिकारों तथा जीविका की स्रोत थी। शासक अपने संबंधियों और रिश्तेदारों की विशिष्ट स्थिति को यथोचित मान-सम्मान दिया करते थे और तथा उसका अंत कर देने के पक्षधर कदापि नहीं थे। राजा या शासक का दरबार अभी भी उसके सामंतों के आभा मंडल से सुशोभित था जहां पर राठौड़ विभिन्न राजपूत जातियों की खांपों के मुखिया उप मुखिया मुगल दरबार की मनसब व्यवस्था की तरह ही श्रेणीगत होकर बंट कर अपनी-अपनी खांप के संबंध सम्मान के आधार पर बैठते थे। यह सम्मान उनके राजा के साथ रक्त के संबंध, अपनी शक्ति राज्य को दी गई उल्लेखनीय सेवाओं से निर्मित होता था। राजपूत दरबार कभी भी चाकरी की स्थिति अनुरुप श्रेणियों में विभाजित नहीं हुआ, यद्यपि यह किसी को सम्मान प्रदान करने में एक कारण अवश्य बन सकता था, बल्कि सदैव ही राज्य की शासकीय जाति, उसकी उप जाति तथा सेवा में आई अन्य सजातीय खांपों के आधार पर ही विभाजित हुआ। कुछ अपवादों को छोड़ कर दरबार का मूल स्वरूप यहीं था।

शासकों ने पट्टों प्रणाली के माध्यम से अधिक से अधिक अपने सामंतों के दायित्वों को निर्धारित कर दिया तथा उनके जागीरी क्षेत्र पर निरीक्षण नियंत्रण की नीति अपना कर राज्य में राजा की स्थिति को निरंकुश बना दिया। इस प्रणाली द्वारा उनकी शक्तियों को विभाजित करके उन्हें राजा की कृपा पर अधिक आश्रित कर दिया। राज्य एक इकाई के रुप में उभरा तथा उसके फलस्वरूप उसकी अखंडता को सुरक्षा मिली। राज्य की आय के स्रोत बढ़े तथा अशांति को फैलाने के अवसर घट गये। (लगातार)

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